Last Updated on August 27, 2026 by gktimehindi
लोकोक्ति – लोक (लोगों) में प्रचलित ऐसी प्रसिद्ध और सारगर्भित उक्ति, जिसमें किसी अनुभव, सत्य, सीख या जीवन-व्यवहार की बात संक्षेप में कही गई हो। लोकोक्ति का शाब्दिक अर्थ है—लोक में कही जाने वाली उक्ति (बात)। यह लोक-जीवन के अनुभव, ज्ञान, सत्य और व्यवहार से बनी प्रसिद्ध उक्ति होती है। लोकोक्ति को अंग्रेजी में Proverb (प्रोवर्ब) या Adage (एडेज) कहते हैं।
लोकोक्ति क्या है?
‘लोकोक्ति’ दो शब्दों से मिलकर बना है—
लोक = सामान्य लोग या समाज + उक्ति = कही हुई बात
अर्थात, समाज में लंबे समय से प्रचलित ऐसी बात, जो लोगों के अनुभव से बनी हो और किसी विशेष परिस्थिति में सीख या संदेश देती हो, लोकोक्ति कहलाती है।
लोकोक्तियाँ अक्सर बहुत छोटी होती हैं, लेकिन उनका अर्थ गहरा होता है। इनमें हमारे पूर्वजों के अनुभव, जीवन की सच्चाइयाँ और व्यवहारिक ज्ञान छिपा होता है।
लोकोक्ति का सारगर्भित अर्थ- “लोक-जीवन के अनुभवों से उत्पन्न, समाज में लंबे समय से प्रचलित तथा किसी विशेष सत्य, शिक्षा या अनुभव को संक्षिप्त एवं प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करने वाली उक्ति को लोकोक्ति कहते हैं।”
लोकोक्ति के उदाहरण
- जैसी करनी वैसी भरनी।
अर्थ—मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है। - अधजल गगरी छलकत जाए।
अर्थ—कम ज्ञान या योग्यता वाला व्यक्ति अधिक दिखावा करता है। - दूर के ढोल सुहावने।
अर्थ—दूर की चीजें वास्तविकता से अधिक अच्छी लगती हैं।
लोकोक्तियों की विशेषताएँ
- लघुता (संक्षिप्तता): लोकोक्ति आकार में बहुत छोटी होती है, लेकिन इसमें ‘गागर में सागर’ भरने की शक्ति होती है यानी छोटे से वाक्य में बहुत बड़ी बात कह दी जाती है।
- लोक-अनुभव का आधार: ये किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं होतीं, बल्कि समाज के दीर्घकालिक अनुभवों, सत्यों और ज्ञान का निचोड़ होती हैं।
- स्वतंत्र अस्तित्व: लोकोक्ति एक पूर्ण और स्वतंत्र वाक्य होती है। यह किसी वाक्य के अंश के रूप में नहीं, बल्कि अपनी पूरी सार्थकता के साथ प्रयुक्त होती है।
- विशेष अर्थ: लोकोक्ति अपने सामान्य या शाब्दिक अर्थ को छोड़कर एक विशेष और गहरा अर्थ प्रकट करती है।
- नैतिक उपदेश और मार्गदर्शन: इनमें जीवन की सच्चाई, उपदेश और शिक्षा छिपी होती है जो समाज का मार्गदर्शन करने और उसे संस्कारित करने का कार्य करती है।
- गद्य और पद्य दोनों में प्रयोग: लोकोक्तियाँ गद्य (साधारण बोलचाल/लेखन) और पद्य (छंद-कविता रूप) दोनों में पाई जाती हैं।
कहावत क्या है?
कहावत वह प्रसिद्ध लोक-वाक्य है जो लोगों के लंबे अनुभव से बना होता है और किसी विशेष परिस्थिति में सीख, व्यंग्य या अनुभव व्यक्त करता है। इसे अंग्रेज़ी में ‘प्रोवर्ब’ (Proverb) कहा जाता है।
कहावत के उदाहरण:
“नाच न जाने, आँगन टेढ़ा।” — अपनी कमी का दोष दूसरों पर लगाना।
“अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।” — समय निकल जाने के बाद पछताने का कोई लाभ नहीं।
“घर की मुर्गी दाल बराबर।” — अपने घर की चीज़ का महत्व न समझना।
कहावत की प्रमुख विशेषताएँ
1.संक्षिप्तता (Shortness): कहावतें बहुत कम शब्दों में बड़ी बात या गहरा अर्थ कह देती हैं।
2.स्मरणीयता (Memorability): कम शब्दों और सुंदर गठन के कारण ये आसानी से याद हो जाती हैं और लंबे समय तक लोगों के जुबान पर रहती हैं।
3.अनुभव-मूलकता (Based on Experience): ये किसी एक व्यक्ति की कल्पना नहीं होतीं, बल्कि समाज के युग-युगों के व्यावहारिक अनुभवों और निरीक्षण से पैदा होती हैं।
4.स्वतंत्र प्रयोग (Independent Use): मुहावरों की तरह कहावतें किसी वाक्य का अंश नहीं होतीं, बल्कि इनका प्रयोग स्वतंत्र वाक्य के रूप में पूरा अर्थ स्पष्ट करने के लिए किया जाता है।
5.सार्वभौमिक सत्य (Universal Truth): इनमें जीवन का कोई ऐसा सच छिपा होता है जिसे समाज के अधिकांश लोग बिना किसी संदेह के स्वीकार करते हैं।
6.लोकप्रियता (Popularity): ये मौखिक परंपरा के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती हैं और आम जनता के बीच अत्यधिक प्रसिद्ध होती हैं।
लोकोक्ति और कहावत में अंतर
| आधार | लोकोक्ति | कहावत |
|---|---|---|
| अर्थ | लोक में प्रचलित प्रसिद्ध उक्ति | अनुभव से निकली लोकप्रिय बात |
| मुख्य उद्देश्य | लोक-अनुभव और जीवन-सत्य व्यक्त करना | सीख, व्यंग्य या व्यवहारिक अनुभव बताना |
| प्रयोग | सामान्य जीवन-सत्य के रूप में भी | किसी विशेष परिस्थिति में अधिक किया जाता है |
| स्वरूप | प्रायः छोटी, सारगर्भित और अर्थपूर्ण | प्रायः छोटी और प्रभावशाली |
| स्रोत | लोक-अनुभव और लोक-ज्ञान | लोक-अनुभव |
हिंदी व्याकरण में “कहावत” और “लोकोक्ति” को अक्सर समान अर्थ में ही प्रयोग किया जाता है। दोनों लोक-प्रचलित अनुभवपूर्ण कथन हैं और इनके बीच कोई कठोर/सर्वमान्य विभाजन नहीं है।
याद रखने की ट्रिक:
कहावत = लोक का अनुभव + सीख/व्यंग्य
लोकोक्ति = लोक में प्रचलित सारगर्भित उक्ति
1000 लोकोक्तियाँ एवं कहावतें (1000 Lokoktiyan aur Kahawatein)
- अंत भला तो सब भला — परिणाम अच्छा हो तो सब अच्छा माना जाता है।
- आँखों का तारा — बहुत प्यारा होना।
- एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है — एक बुरा व्यक्ति सबको बदनाम करता है।
- एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं — दो शक्तिशाली व्यक्ति साथ नहीं रह सकते।
- चोर-चोर मौसेरे भाई — समान स्वभाव वाले लोग आपस में मिल जाते हैं। एक ही जैसे बुरे स्वाभाव या धंधे वाले लोग जल्दी दोस्त बन जाते हैं। एक ही जैसे गलत धंधे या दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोग आपस में जल्दी मित्र बन जाते हैं।
- चित्त भी मेरी, पट भी मेरी — हर स्थिति में अपना लाभ।
- जिसकी करनी, उसकी भरनी — कर्म का फल मिलता है।
- जैसा बोओगे, वैसा काटोगे — कर्म के अनुसार फल मिलता है।
- जैसा देश, वैसा भेष — स्थान के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। जहाँ रहें, वहाँ की संस्कृति और रीति-रिवाजों के अनुसार ढल जाना चाहिए।
- जल में रहकर मगर से बैर — आश्रयदाता से शत्रुता करना। अपने क्षेत्र के ताकतवर व्यक्ति से दुश्मनी मोल लेना मूर्खता है।
- जहाँ चाह, वहाँ राह — दृढ़ इच्छा से रास्ता मिलता है। यदि मन में दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो सफलता का रास्ता मिल ही जाता है।
- जहाँ धुआँ, वहाँ आग — हर बात के पीछे कोई कारण होता है।
- देर आए, दुरुस्त आए — देर से सही, पर ठीक होना अच्छा है।
- नेकी कर, दरिया में डाल — भलाई करके बदले की अपेक्षा न रखना।
- बगल में छुरी, मुँह में राम-राम — कपटपूर्ण व्यवहार।
- रस्सी जल गई, बल नहीं गया — सब कुछ नष्ट होने पर भी अकड़ नहीं गई। सर्वनाश या सब कुछ नष्ट होने पर भी घमंड का न छूटना।
- समय बड़ा बलवान — समय सबसे शक्तिशाली होता है।
- आम बोकर बबूल कहाँ से होय — जैसा कर्म, वैसा परिणाम।
- आग में घी डालना — विवाद को और बढ़ाना।
- आग लगाकर तमाशा देखना — समस्या पैदा करके मजा लेना।
- आटे-दाल का भाव मालूम होना — वास्तविक कठिनाइयों का अनुभव होना।
- उड़ती चिड़िया के पंख गिनना — बहुत चालाक होना।
- एक आँख से रोना, दूसरी से हँसना — दुख और सुख साथ होना।
- कमाई अठन्नी, खर्चा रुपैया — आय से अधिक खर्च।
- कान पर जूँ न रेंगना — कोई प्रभाव न पड़ना।
- घर फूँक तमाशा देखना — अपना नुकसान करके भी दिखावा करना।
- चादर देखकर पैर पसारना — आय के अनुसार खर्च करना।
- चोर की माँ कोठरी में मुँह छिपाए — दोषी व्यक्ति लज्जित रहता है।
- चार पैसे की मुर्गी, बारह पैसे का मसाला — छोटी वस्तु पर अधिक खर्च।
- चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता — समझाने का कोई असर न होना।
- जिसकी खेती, उसकी मेड़ — अधिकार उसी का होता है।
- टेढ़ी उँगली से घी निकलता है — कभी-कभी कठोर उपाय जरूरी होता है।
- ढाक के तीन पात — स्थिति में कोई बदलाव न होना। कोई परिवर्तन न होना। हमेशा एक ही जैसी ढर्रे वाली स्थिति बने रहना, कोई सुधार न होना।
- दिन में तारे दिखना — बहुत कष्ट होना।
- बंदर के हाथ में उस्तरा — अयोग्य व्यक्ति को खतरनाक साधन मिलना। अयोग्य के हाथ शक्ति आना।
- बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा — अचानक लाभ मिलना।
- रंगे हाथ पकड़ा जाना — अपराध करते हुए पकड़ा जाना।
- सिर पर कफन बाँधना — जान की परवाह न करना।
- हाथ धोकर पीछे पड़ना — पूरी तरह किसी के पीछे लग जाना।
- हवन करते हाथ जलना — अच्छे काम में भी कठिनाई आना।
- आँखों में धूल झोंकना — धोखा देना।
- आँखों पर पट्टी बाँधना — जानबूझकर सच्चाई न देखना।
- कान भरना — किसी के विरुद्ध भड़काना।
- कानोंकान खबर न होना — बिल्कुल पता न चलना।
- खून-पसीना एक करना — बहुत मेहनत करना।
- खून का घूँट पीना — अपमान/क्रोध सह लेना।
- खून सफेद होना — संबंधों में प्रेम समाप्त होना।
- खून खौलना — बहुत क्रोधित होना।
- गले का हार होना — बहुत प्रिय होना।
- गले की हड्डी बनना — बड़ी परेशानी बन जाना। कठिन समस्या बन जाना।
- गले पड़ना — जबरन पीछे पड़ना।
- गले का फंदा — बड़ी मुसीबत।
- गीदड़ भभकी देना — खोखली धमकी देना।
- घी के दीये जलाना — बहुत खुशी मनाना।
- चाँदी काटना — खूब लाभ कमाना।
- चाँदी के जूते मारना — रिश्वत देना।
- चूहे के चबाए कपड़े — बहुत पुरानी/घिसी वस्तु।
- छाती पर साँप लोटना — बहुत ईर्ष्या होना।
- छाती ठोकना — गर्व से दावा करना।
- छक्के छुड़ाना — बुरी तरह परास्त करना।
- छप्पर फाड़कर देना — अचानक बहुत अधिक मिलना।
- जले पर नमक छिड़कना — दुख बढ़ाना।
- जान के लाले पड़ना — बहुत संकट में पड़ना।
- जान में जान आना — राहत मिलना।
- जी का जंजाल — बड़ी परेशानी। अत्यंत परेशान करने वाली वस्तु।
- जीती मक्खी निगलना — जानबूझकर अपमान सहना।
- टस से मस न होना — बिल्कुल न हिलना/न बदलना। अपने निर्णय से न हटना।
- टुकड़ों पर पलना — दूसरों पर निर्भर रहना।
- टेढ़ी खीर — बहुत कठिन काम।
- टका-सा जवाब देना — साफ मना कर देना।
- दाल में काला — कुछ गड़बड़ होना।
- दाँव पर लगाना — जोखिम में डालना।
- नाक कटना — अपमान होना।
- नाक में दम करना — बहुत परेशान करना।
- नाकों चने चबवाना — बहुत परेशान करना।
- नाक रखना — सम्मान बचाना।
- नौ दो ग्यारह होना — भाग जाना।
- पानी-पानी होना — बहुत लज्जित होना।
- पानी फेर देना — मेहनत/योजना को विफल करना। प्रयास निष्फल कर देना।
- पानी सिर से ऊपर होना — संकट सीमा से बाहर होना।
- पेट में चूहे कूदना — बहुत भूख लगना।
- पेट का पानी न पचना — बात छिपाकर न रख पाना।
- पैर तले जमीन खिसकना — बहुत घबरा जाना।
- पैर में कुल्हाड़ी मारना — स्वयं अपना नुकसान करना।
- पलक पाँवड़े बिछाना — बहुत स्वागत करना।
- पाप का घड़ा भरना — बुराइयों की सीमा पूरी होना।
- पसीना छूटना — बहुत कठिनाई होना।
- पीठ में छुरा घोंपना — विश्वासघात करना।
- पेट में दाढ़ी होना — बहुत चालाक होना।
- मुँह की बात छीन लेना — वही बात पहले कह देना।
- मुँह पर ताला लगाना — चुप रहना।
- रंग में भंग पड़ना — खुशी में बाधा आना।
- सिर आँखों पर रखना — बहुत सम्मान देना। सम्मानपूर्वक स्वीकार करना।
- सिर पर आसमान उठाना — बहुत शोर मचाना।
- साँप निकल गया, लकीर पीटना — अवसर निकल जाने के बाद प्रयास करना।
- दिन-दहाड़े आँखों में धूल झोंकना — खुलेआम धोखा देना।
- शेर की खाल में गीदड़ — बाहरी रूप से शक्तिशाली, अंदर से कमजोर।
- सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली — बहुत पाप करने के बाद धार्मिकता का दिखावा। पाप करके धर्म का दिखावा।
- साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे — चतुराई से दोनों काम निकालना।
- चमकते चाँद पर दाग — अच्छे व्यक्ति/वस्तु में भी कमी होना।
- जिसकी रखवाली, वही खेत खाए — रक्षक का ही भक्षक बन जाना। रक्षक ही नुकसान करे।
- घर की बात घर में रखना — निजी बात को बाहर न बताना।
- एक चुप सौ को हराए — मौन रहने से विवाद समाप्त हो सकता है।
- बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की — रहस्य छिपा रहे तो मूल्यवान है।
- जिसकी जैसी नीयत, वैसी बरकत — परिणाम व्यक्ति की नीयत और कर्म पर निर्भर करता है।
- अंत समय में सबको अपनी पड़ी — संकट में हर व्यक्ति अपना हित देखता है।
- अंधे की लकड़ी — एकमात्र सहारा।
- अपनी गली में कुत्ता भी शेर — अपने क्षेत्र में कमजोर भी ताकतवर बन जाता है।
- अपनी करनी पार उतरनी — अपने कर्मों का फल स्वयं भोगना पड़ता है।
- अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना — स्वयं अपना नुकसान करना।
- अपने हाथ जगन्नाथ — अपना काम स्वयं करना सबसे अच्छा है।
- अपने घर में कुत्ता भी शेर — अपने घर में सभी प्रभावशाली होते हैं।
- अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता — स्वयं अनुभव किए बिना वास्तविकता नहीं समझ आती।
- अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे — कठिन परिस्थिति में असली परीक्षा होना।
- आम के पेड़ को पत्थर ही पड़ते हैं — गुणी व्यक्ति को ही अधिक आलोचना सहनी पड़ती है।
- आम खाओ, पेड़ मत गिनो — परिणाम पर ध्यान दो, अनावश्यक विवरण पर नहीं।
- आकाश का फल, हाथ न आए — अप्राप्य वस्तु की इच्छा करना।
- आग बिना धुआँ नहीं — बिना कारण कोई बात नहीं होती।
- आग लगे बस्ती में, हम अपनी मस्ती में — दूसरों की परेशानी से बेपरवाह रहना।
- आगे की सोच पीछे की भूल — भविष्य की चिंता में वर्तमान की भूल न करनी चाहिए।
- आप मरे जग डूबा — व्यक्ति के समाप्त होते ही उसके लिए संसार का महत्व समाप्त हो जाता है।
- आप नंगा क्या नहाए, क्या निचोड़े — जिसके पास कुछ नहीं, उसे खोने का डर नहीं।
- आसमान का थूका मुँह पर पड़ता है — दूसरों को अपमानित करने वाला स्वयं अपमानित होता है।
- आसमान से बातें करना — बहुत ऊँचा होना।
- आसमान में थिगली लगाना — असंभव काम करने का प्रयास।
- इमली के पत्ते पर तीनों लोक — बहुत कम जगह में बहुत कुछ समाना।
- ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं — न्याय देर से मिल सकता है, पर मिलता है।
- उँगली पकड़कर पहुँचा पकड़ना — थोड़ी छूट पाकर बहुत अधिक अधिकार जमाना। मिली छूट का अनुचित लाभ उठाना।
- उड़ता तीर लेना — स्वयं मुसीबत मोल लेना।
- उल्टी गंगा बहाना — स्वाभाविक व्यवस्था के विपरीत काम करना।
- उल्टी माला फेरना — गलत दिशा में काम करना।
- ऊँट किस करवट बैठे — परिणाम का पता न होना।
- ऊँट पहाड़ के नीचे — घमंड का टूटना।
- एक आँख से काना, दूसरी से अंधा — पूरी तरह अयोग्य होना।
- एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले — लेन-देन बराबर होना।
- एक लाठी से सबको हाँकना — सबको एक ही दृष्टि से देखना।
- एक चना भाड़ नहीं फोड़ता — अकेला व्यक्ति बड़ा काम नहीं कर सकता। अकेला प्रयास अपर्याप्त होना।
- एक मछली तालाब गंदा करे — एक बुरा व्यक्ति पूरे समूह को बदनाम करता है।
- एक न एक दिन पोल खुलती है — सच्चाई हमेशा सामने आती है।
- एक थैली के चट्टे-बट्टे — एक जैसे स्वभाव वाले लोग।
- एक ही लकड़ी के घुन — समान दोष वाले लोग।
- एक हाथ में लड्डू, दूसरे में पेड़ा — दोनों ओर लाभ होना।
- एक मुँह दो बातें — व्यक्ति का बार-बार बात बदलना। कथन में विरोधाभास।
- एक म्यान में दो तलवारें — दो शक्तिशाली व्यक्तियों का साथ न रहना।
- एक साधे सब सधै, सब साधे सब जाए — एक लक्ष्य पर ध्यान देने से सफलता मिलती है।
- एक और एक दो होते हैं, ग्यारह नहीं — परिस्थिति के अनुसार शक्ति का आकलन करना चाहिए।
- ओढ़ी चादर पैर पसार — अपनी सीमा में रहना।
- खोदा पहाड़, निकली चुहिया — बहुत मेहनत के बाद थोड़ा परिणाम। बहुत अधिक मेहनत करने पर भी बहुत कम फल मिलना। बहुत प्रयास पर कम परिणाम।
- खून का बदला खून — बदले की भावना रखना। प्रतिशोध की भावना।
- खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना — लाभ कुछ नहीं, नुकसान अधिक।

- खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा — गलती किसी की और सजा किसी को।
- खेत रहे किसान, मोल रहे व्यापारी — मेहनत किसी की, लाभ किसी और का।
- खाली बर्तन अधिक बजता है — कम ज्ञान वाला अधिक बोलता है।
- खाली दिमाग शैतान का घर — व्यस्तता न होने पर बुरे विचार आ सकते हैं।
- खाया-पिया और चल दिए — बिना जिम्मेदारी के काम करना।
- खून खौलना और पानी न होना — अत्यधिक क्रोध होना।
- खूँटे से बँधी गाय — किसी के नियंत्रण में होना।
- खिसियाहट में दाँत पीसना — असफलता से बहुत चिढ़ना।
- गधा घोड़ा नहीं बनता — मूल स्वभाव आसानी से नहीं बदलता।
- गधा क्या जाने केसर की कीमत — अयोग्य व्यक्ति गुण का मूल्य नहीं समझता।
- गधे के सिर से सींग — अचानक गायब हो जाना।
- गधे को बाप बनाना — स्वार्थ के लिए अयोग्य व्यक्ति को भी सम्मान देना।
- गंगा नहाए, पाप न जाए — केवल बाहरी कर्म से दोष समाप्त नहीं होते।
- गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है — दोषी के साथ निर्दोष भी प्रभावित होता है।
- गोबर गणेश — बहुत भोला या अनाड़ी व्यक्ति।
- गड़े धन का क्या भरोसा — छिपी वस्तु का कोई निश्चित भरोसा नहीं।
- गुड़ न दे, गुड़ जैसी बात तो करे — वस्तु न सही, मधुर व्यवहार तो करे।
- गुरु गुड़, चेला चीनी — शिष्य का गुरु से भी आगे निकल जाना।
- घर आया नाग न पूजना — सामने आए अवसर का लाभ न उठाना।
- घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने — साधन न होते हुए भी बड़े काम की तैयारी करना। साधन न होते हुए दिखावा करना।
- घर में चोर, बाहर ढिंढोरा — दोष अपने में हो और आरोप दूसरों पर।
- घर बैठे गंगा आना — बिना प्रयास के बड़ी सुविधा मिलना।
- घर का कूड़ा बाहर करना — घरेलू बात दूसरों को बताना।
- घर फूँककर तमाशा देखना — स्वयं का नुकसान करके मनोरंजन करना।
- घर में आग लगाकर कुआँ खोदना — संकट आने के बाद उपाय करना।
- घर का न घाट का — कहीं का न रहना।
- चोर की चोट, ऊपर से रोब — गलती करके भी अकड़ना।
- चोर की चौकसी — गलत व्यक्ति से सुरक्षा की उम्मीद।
- चोर की माँ का दिल धड़कता है — दोषी व्यक्ति भयभीत रहता है।
- चोर बोले जोर से — दोषी व्यक्ति ही अधिक शोर मचाए।
- चोर को मोर — चालाक का सामना और अधिक चालाक से होना।
- चोर की लँगोटी भी बड़ी — संकट में छोटी वस्तु भी मूल्यवान लगती है।
- चोर गया, लंगोटी रह गई — सब कुछ चला जाना, थोड़ा ही बचना।
- चोर की आँख में तिनका — दोषी व्यक्ति छोटी बात से भी डरता है।
- चोर के घर छत नहीं होती — अपराधी हमेशा भय में रहता है।
- चोर-चोर कहने से चोर नहीं बनता — केवल आरोप लगाने से अपराध सिद्ध नहीं होता।
- चूहे की जान बिल्ली में — कमजोर व्यक्ति शक्तिशाली के डर में रहना।
- चूहे को हल्दी की गाँठ मिली, पंसारी बन बैठा — थोड़ी सफलता से घमंड करना।
- चूहे के बिल में बिल्ली का पहरा — संकट से बचने का कोई रास्ता न होना।
- चुल्लू भर पानी में डूबना — अत्यधिक शर्मिंदा होना। बहुत शर्मिंदा होना। बहुत लज्जित होना।
- चोर की चोरी, ऊपर से सीनाजोरी — अपराध करके भी अकड़ना।
- चंदन की लकड़ी में साँप लिपटे रहना — अच्छी जगह पर बुरे व्यक्ति का होना।
- चाँद को दाग लगना — अच्छी चीज में भी दोष होना।
- चार पैसे क्या आए, अकड़ने लगे — थोड़ी संपत्ति से घमंड करना।
- चार बर्तन होंगे तो खड़केंगे — साथ रहने वालों में मतभेद होना स्वाभाविक है।
- चार आने की मुर्गी, बारह आने का मसाला — वस्तु से अधिक खर्च करना।
- चोर के पैर नहीं होते — अपराधी ज्यादा देर छिप नहीं सकता।
- छाती पर मूँग दलना — जानबूझकर किसी को परेशान करना। जानबूझकर कष्ट देना।
- छींका टूटा, बिल्ली के भाग्य से — अचानक लाभ मिलना।
- छप्पर पर कौआ बोले, मेहमान आए — पुराने विश्वास के अनुसार संकेत से घटना का अनुमान लगाना।
- छेद में उँगली डालना — अनावश्यक परेशानी खड़ी करना।
- जैसा संग, वैसा रंग — संगति का प्रभाव पड़ता है।
- जैसा अन्न, वैसा मन — भोजन और वातावरण का मन पर प्रभाव पड़ता है। वातावरण और भोजन का स्वभाव पर प्रभाव पड़ता है।
- जैसा राजा, वैसी प्रजा — शासक जैसा होता है, प्रजा भी वैसी होती है।
- जैसा कर्म, वैसा फल — कर्म का फल निश्चित मिलता है।
- जैसी करनी, वैसी भरनी — अपने कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है। कर्म का फल मिलता है। कर्मफल निश्चित है। इंसान को अपने कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है। इंसान को अपने कर्मों के अनुसार ही फल भुगतना पड़ता है।
- जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि — देखने का नजरिया अनुभव को प्रभावित करता है। दुनिया वैसी ही दिखाई देती है जैसा हमारा दृष्टिकोण होता है।
- जैसी नीयत, वैसी बरकत — अच्छे उद्देश्य से अच्छे परिणाम मिलते हैं।
- जहाँ चार बर्तन, वहाँ खटकना — साथ रहने वालों में मतभेद होना।
- जहाँ का गुड़, वहीं की मक्खी — लाभ जहाँ हो, लोग वहीं जाते हैं।
- जहाँ की खाई, वहीं का पानी — अपने स्थान की चीज अधिक उपयोगी होती है।
- जहाँ न पहुँचे बैलगाड़ी, वहाँ पहुँचे पैदल — दृढ़ प्रयास से कठिन स्थान तक पहुँचना।
- जहाँ धुआँ होता है, वहाँ आग भी होती है — बात का कोई आधार अवश्य होता है।
- जितनी लंबी चादर, उतने ही पैर — साधन के अनुसार जीवन चलाना चाहिए।
- जितना बड़ा मुँह, उतनी बड़ी बात — अधिक बोलने वाला बढ़ा-चढ़ाकर कहता है। क्षमता से अधिक दावे करना।
- जितनी खेती उतना अन्न — क्षमता के अनुसार परिणाम मिलता है।
- जिसकी पूँछ टेढ़ी, उसकी चाल भी टेढ़ी — स्वभाव आसानी से नहीं बदलता।
- जिसकी जैसी संगति, वैसी रंगति — संगति का प्रभाव पड़ता है।
- जिसकी बंदूक उसकी बारात — जिसके पास साधन, उसी का प्रभाव।
- जिसकी नाव में छेद हो, वह नदी से डरता है — दोषी व्यक्ति संकट से डरता है।
- जिसके घर शीशे के हों, वह दूसरों के घर पत्थर न फेंके — दोषी व्यक्ति दूसरों की आलोचना न करे। स्वयं दोषी होकर दूसरों की आलोचना न करना।
- जिसकी आँख खुली, उसका संसार खुला — जागरूक व्यक्ति अधिक समझता है।
- जीभ के आगे पेट है — बोलने से पहले परिणाम सोचना चाहिए।
- जैसा मुँह वैसी बात — व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार बोलता है।
- टका सेर भाजी, टका सेर खाजा — हर चीज का समान मूल्य होना।
- टके की हाँडी, नौ टके का मसाला — छोटी वस्तु पर बहुत अधिक खर्च।
- टाँग पर टाँग रखकर बैठना — बिना काम के आराम करना।
- टुकड़ों पर पलने वाला — दूसरों पर निर्भर रहने वाला।
- टोपी बदलने से आदमी नहीं बदलता — केवल बाहरी रूप बदलने से स्वभाव नहीं बदलता।
- डाल पर बैठकर उसी को काटना — अपने ही आधार को नष्ट करना।
- डूबती नाव को कौन बचाए — बड़ी मुसीबत में सहायता कठिन होती है।
- ढूँढ़ते रह गए, हाथ कुछ न आया — बहुत प्रयास के बाद भी असफल होना।
- तिल का ताड़ बनाना — छोटी बात को बहुत बड़ा बनाना।
- तिल धरने की जगह न होना — बहुत भीड़ होना।
- तेली का बैल — लगातार काम में लगा रहना।
- तेल देखो, तेल की धार देखो — परिस्थिति देखकर निर्णय लेना। कोई भी निर्णय लेने से पहले परिस्थिति और उसके रुख को अच्छे से समझो। कोई भी नया कदम उठाने से पहले परिस्थिति और माहौल का अच्छे से मुआयना कर लेना।
- थोथा चना बाजे घना — कम ज्ञान वाला अधिक दिखावा करता है।
- थोड़ी पूँजी, बड़ा व्यापार — सीमित साधनों से बड़ी आकांक्षा।
- दाँतों तले उँगली दबाना — बहुत आश्चर्य होना।
- दाल में कुछ काला है — कुछ गड़बड़ होना। मामला संदिग्ध है। किसी मामले में कोई गुप्त बात या संदेह की स्थिति होना।
- दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम — हर वस्तु का उपभोगकर्ता निश्चित होता है। हर व्यक्ति को उसके भाग्य का अन्न या सुख ज़रूर मिलता है। हर एक वस्तु पर उसके असली हकदार का अधिकार तय होता है।
- दाने को तरसे, पत्ते को बरसे — अत्यधिक अभाव होना।
- दिन बड़े या रात — समय के महत्व का प्रश्न।
- दिन फिरना — अच्छे दिन आना।
- दिन का भूला शाम को घर आए तो भूला नहीं — गलती के बाद लौटना अच्छा है।
- दीवार के भी कान होते हैं — गुप्त बात सावधानी से करनी चाहिए।
- दूध और पानी का मेल — घनिष्ठ संबंध होना।
- दूध में नींबू पड़ना — अच्छे संबंध में खटास आना।
- नक्कारखाने में तूती की आवाज — बड़े समूह में छोटे की बात न सुनी जाना। बड़े शोर में छोटी आवाज दब जाना।
- नंगा क्या नहाए, क्या निचोड़े — जिसके पास कुछ नहीं, उसे खोने का डर नहीं।
- न नौ नकद, न तेरह उधार — तत्काल लाभ को प्राथमिकता देना।
- न रहेगा रोग, न रहेगा रोगी — कारण समाप्त होने पर समस्या समाप्त।
- नाक का सवाल — प्रतिष्ठा का प्रश्न।
- नाक में नकेल डालना — किसी को नियंत्रण में रखना।
- नाक रगड़ना — बहुत विनती करना।
- नानी याद आना — बहुत कठिनाई में पड़ना।
- निंदक नियरे राखिए — आलोचक से अपनी कमियाँ पता चलती हैं।
- नौ दिन चले अढ़ाई कोस — बहुत धीमी गति से काम होना।
- नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली — बहुत बुराई के बाद धार्मिकता का दिखावा। जीवनभर पाप करने के बाद अंत में पवित्रता या ढोंग का नाटक करना।
- पानी में रहकर मगर से बैर — आश्रयदाता से शत्रुता करना।
- पानी सिर से गुजरना — स्थिति नियंत्रण से बाहर होना।
- पानी फेरना — किसी प्रयास को विफल कर देना।
- पानी में लकीर खींचना — असंभव या व्यर्थ काम करना।
- पगड़ी उछालना — अपमान करना।
- पगड़ी रखना — सम्मान बचाना।
- पत्थर पर दूब उगाना — असंभव काम कर दिखाना।
- पत्थर की लकीर — अटल निर्णय।
- पर उपदेश कुशल बहुतेरे — दूसरों को सलाह देना आसान है।
- पराई थाली का घी अच्छा — दूसरों की वस्तु अच्छी लगना।
- पेट काटकर पालना — अपनी जरूरतें छोड़कर किसी का पालन करना।
- पेट पूजा करना — भोजन करना।
- पेट के लिए सब करना पड़ता है — जीवन-निर्वाह की मजबूरी होना।
- पैर की जूती समझना — बहुत तुच्छ समझना।
- पैर में बेड़ी पड़ना — स्वतंत्रता समाप्त होना।
- पैर पसारना — सीमा से अधिक खर्च करना।
- प्यासे को कुएँ के पास जाना चाहिए — आवश्यकता वाले को स्वयं प्रयास करना चाहिए।
- पूत के पाँव पालने में दिखाई देते हैं — प्रतिभा बचपन से दिखाई देती है।
- पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय — योग्य संतान स्वयं संभालती है, अयोग्य धन नष्ट कर देती है।
- बंदर बाँट — किसी वस्तु का अनुचित बँटवारा।
- बंद मुट्ठी लाख की — रहस्य छिपा रहने में लाभ है।
- बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा — पास की चीज के लिए दूर खोज करना।
- बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख — भाग्य का महत्व।
- बिन पानी सब सून — आवश्यक वस्तु के बिना सब व्यर्थ।
- बिना मेहनत के फल नहीं मिलता — सफलता के लिए परिश्रम आवश्यक है।
- बिन बुलाए मेहमान — बिना निमंत्रण आने वाला व्यक्ति।
- बिन बादल बरसात नहीं — हर परिणाम का कोई कारण होता है।
- बुरे काम का बुरा नतीजा — गलत कर्म का गलत परिणाम होता है।
- बूँद-बूँद से घड़ा भरता है — थोड़ी-थोड़ी बचत से बड़ी राशि बनती है। छोटी बचत से बड़ा संचय।
- बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम — उम्र के विपरीत बनाव-श्रृंगार करना।
- भागते भूत की लंगोटी भली — संकट में थोड़ा लाभ भी अच्छा।
- मन के हारे हार है, मन के जीते जीत — आत्मविश्वास से सफलता मिलती है।
- मन में राम, हाथ में काम — भक्ति के साथ कर्म भी जरूरी है।
- मुँह और मसूर की दाल — अपनी क्षमता से बहुत बड़ी बात करना।
- मुँह पर राम, बगल में छुरी — कपटपूर्ण व्यवहार करना या बाहर से मित्रवत (अच्छा) दिखना, लेकिन मन में शत्रुता रखना और पीठ पीछे नुकसान पहुँचाना।
- मुँह की खानी — हार जाना।
- मुँह में पानी भरना — खाने की इच्छा होना।
- मरने के बाद दवा — समय निकल जाने पर उपाय करना व्यर्थ है।
- मरे को मारे शाह मदार — कमजोर पर और अत्याचार करना।
- महँगी रोए एक बार, सस्ती रोए बार-बार — अच्छी वस्तु खरीदना अधिक लाभदायक हो सकता है।
- मुँह धोकर पीछे पड़ना — पूरी तरह किसी के पीछे पड़ जाना।
- मुँह में दही जमाना — बिल्कुल चुप रहना।
- मुँह की बात मुँह में रह जाना — इच्छा व्यक्त न कर पाना।
- रस्सी जल गई, ऐंठन न गई — सब कुछ समाप्त होने पर भी अकड़ न जाना।
- रात गई, बात गई — पुरानी बात भूल जाना।
- रात थोड़ी, भेष बहुत — समय कम और काम बहुत।
- रात में तारे गिनना — चिंता या बेचैनी में सो न पाना।
- लाख दुखों की एक दवा — किसी एक उपाय से अनेक समस्याएँ हल होना।
- लाख कहो, एक न माने — जिद्दी व्यक्ति समझाने से न माने।
- लोमड़ी के अंगूर खट्टे — अप्राप्य वस्तु को बुरा कहना।
- लोहे के चने चबाना — अत्यंत कठिन काम करना।
- वक्त बड़ा बलवान — समय परिस्थितियाँ बदल देता है।
- वक्त किसी का इंतजार नहीं करता — समय लगातार चलता रहता है।
- विपत्ति में ही मित्र की पहचान होती है — संकट में सच्चे मित्र का पता चलता है।
- विपत्ति अकेली नहीं आती — एक समस्या के साथ दूसरी समस्या भी आ सकती है।
- समय और ज्वार किसी की प्रतीक्षा नहीं करते — अवसर निकल जाने पर वापस नहीं आता।
- सौ कुत्तों की एक बिल्ली — एक शक्तिशाली व्यक्ति कई कमजोरों पर भारी पड़ता है।
- साँप के मुँह में छछूँदर — ऐसी कठिन स्थिति जिसमें आगे-पीछे दोनों ओर परेशानी हो।
- साँप सूँघ जाना — अचानक बिल्कुल चुप हो जाना।
- सिर सलामत तो पगड़ी पचास — जीवन सुरक्षित हो तो बाकी नुकसान सहने योग्य है।
- हाथी के पाँव में सबका पाँव — बड़े के साथ छोटे का महत्व कम हो जाता है।
- हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंकें हजार — दूसरों की आलोचना की चिंता किए बिना अपने काम और लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए। बड़े व्यक्ति की आलोचना बहुत लोग करते हैं।
- होनी को कौन टाल सकता है — भाग्य में लिखी घटना को रोकना कठिन है।
- जिसकी जैसी करनी, वैसी भरनी — मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है।
- मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन – बिना किसी खर्च या मेहनत के कोई चीज़ मुफ्त में मिल जाने पर, उसका जी भरकर या अत्यधिक इस्तेमाल (या दुरुपयोग) करना।
- अधजल गगरी छलकत जाए – कम ज्ञान या योग्यता वाला व्यक्ति अधिक दिखावा करता है।
- आगे कुआँ पीछे खाई – हर तरफ से विपत्ति या संकट में फँसना।
- आप भले तो जग भला – यदि आप अच्छे हैं, तो पूरी दुनिया आपके लिए अच्छी है।
- आम के आम गुठलियों के दाम – किसी काम से दोहरा लाभ उठाना।
- एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा – एक दोष के साथ-साथ दूसरा दोष भी होना। बुराई पर बुराई जुड़ना। एक तो पहले से ही बुरा था, ऊपर से बुरी संगति और मिल गई।
- काला अक्षर भैंस बराबर – बिल्कुल अनपढ़ या निरक्षर होना।
- जो गरजते हैं, वे बरसते नहीं – जो लोग केवल बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वे काम नहीं करते।
- नाच न जाने आँगन टेढ़ा – अपनी कमी को छिपाने के लिए दूसरों या चीज़ों में दोष निकालना। अपनी कमी का दोष दूसरों पर देना।
- पराय धन पर लक्ष्मीनारायण – दूसरों के पैसों पर ऐश करना या उदारता दिखाना।
- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद – अज्ञानी व्यक्ति अच्छी वस्तु की कीमत नहीं समझ सकता।
- हाथ कंगन को आरसी क्या – प्रत्यक्ष बात को प्रमाणित करने के लिए किसी सबूत की ज़रूरत नहीं होती।
- अंधों में काना राजा – मूर्खों के बीच कम ज्ञान वाला व्यक्ति भी विद्वान माना जाता है।
- अक्ल बड़ी या भैंस – शारीरिक ताकत की तुलना में बुद्धि हमेशा श्रेष्ठ होती है।
- आ बैल मुझे मार – जानबूझकर खुद को मुसीबत में डालना।
- उलटा चोर कोतवाल को डांटे – अपना अपराध स्वीकार न करके उल्टा पूछने वाले पर ही बिगड़ना। खुद गलती करना और सामने वाले पर ही रोब जमाना।
- ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना – जब कठिन काम शुरू कर ही दिया, तो आने वाली मुश्किलों से क्या घबराना। जोखिम लिया है तो कठिनाइयों से न डरना।
- कंगाली में आटा गीला – मुसीबत के समय एक और नई मुसीबत का आ जाना। संकट पर संकट आना।
- चिराग तले अंधेरा – दूसरों को उपदेश देने वाले व्यक्ति के अपने घर या पास में ही बुराई होना। दूसरों को उपदेश देने वाले के अपने घर में ही दोष होना। पास की चीज की अनदेखी।
- छोटा मुँह बड़ी बात – अपनी हैसियत या योग्यता से बढ़कर बातें करना। अपनी उम्र, हैसियत या योग्यता से बढ़कर बड़ी-बड़ी बातें करना। क्षमता से अधिक बोलना।
- जंगल में मोर नाचा किसने देखा – ऐसी जगह पर अपनी खूबी दिखाना जहाँ उसकी कद्र करने वाला कोई न हो। गुण का प्रदर्शन न हो तो उसका मूल्य कम हो जाता है। गुण की पहचान न होना।
- दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है – एक बार धोखा खाने के बाद इंसान बहुत सावधान हो जाता है। चोट खाया व्यक्ति सावधान रहता है। अनुभव के बाद सावधानी बढ़ जाती है।
- नौ नगद न तेरह उधार – भविष्य के बड़े लाभ की तुलना में वर्तमान का छोटा लाभ ही बेहतर होता है। तुरंत लाभ को प्राथमिकता देना।
- पढ़े फारसी बेचे तेल, यह देखो कुदरत का खेल – योग्यता होने पर भी भाग्यवश छोटा या तुच्छ काम करना।
- बगला भगत होना – ऊपर से सीधा या साधु दिखना पर अंदर से कपटी होना।
- बासी बचे न कुत्ता खाए – जरूरत के हिसाब से ही काम करना ताकि कुछ भी बर्बाद न हो।
- मान न मान मैं तेरा मेहमान – जबरदस्ती किसी के गले पड़ना या संबंध जोड़ना।

- मेंढकी को भी जुकाम होना – ओछे या छोटे व्यक्ति द्वारा नखरे दिखाना या बड़ा बनने का ढोंग करना।
- अपना हाथ जगन्नाथ – अपना काम खुद करना ही सबसे उत्तम और सुखदाई होता है।
- अशर्फियाँ लुटें कोयलों पर मुहर – मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर तुच्छ चीज़ों की रक्षा करना।
- आँख ओझल पहाड़ ओझल – जो आँखों के सामने नहीं रहता, उसका प्रभाव भी धीरे-धीरे कम हो जाता है।
- इतनी सी जान गज भर की ज़बान – उम्र या कद में छोटा होना पर बहुत बढ़-चढ़कर बातें करना।
- उधार का खाना और फूंस का तापना -उधार लेकर ऐश करना बहुत कम समय का सुख होता है।
- ऊधो का लेना न माधो का देना – किसी से कोई वास्ता या मतलब न रखना, बिल्कुल तटस्थ रहना। किसी भी तरह के फालतू लफड़े या विवाद से बिल्कुल दूर रहना।
- एक और एक ग्यारह होते हैं – संगठन या एकता में बहुत बड़ी शक्ति होती है।
- काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती – धोखेबाज़ी या छल-कपट का व्यवहार केवल एक ही बार चलता है, बार-बार नहीं। छल-कपट से काम सिर्फ एक ही बार निकलता है। छल बार-बार सफल नहीं होता।
- काले के आगे चिराग नहीं जलता – शक्तिशाली या दुष्ट व्यक्ति के सामने कमज़ोर की कोई बात नहीं टिकती।
- कुत्ता भी दुम हिलाकर बैठता है – सफ़ाई और सलीका सबको पसंद होता है, यहाँ तक कि पशु भी अपनी जगह साफ़ करता है।
- खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है – एक व्यक्ति को देखकर दूसरा व्यक्ति भी वैसा ही व्यवहार करने लगता है। संगति का प्रभाव पड़ता है।
- गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास – अवसरवादी होना या परिस्थिति के हिसाब से अपना दल/विचार बदल लेना। परिस्थिति के अनुसार पक्ष बदलना। अवसर के अनुसार पक्ष बदलना।
- गरीबी में आटा गीला होना – परेशानी के समय एक और बड़ी मुसीबत का आ जाना।
- घर की मुर्गी दाल बराबर – अपने पास मौजूद कीमती वस्तु या गुणी व्यक्ति का कोई आदर न करना। अपने व्यक्ति/वस्तु का मूल्य न समझना। अपनी चीज की कद्र न करना।
- घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध – अपने क्षेत्र के विद्वान की कद्र नहीं होती, बाहरी व्यक्ति को अधिक सम्मान मिलता है।
- चमगादड़ के घर मेहमान आए, दोनों लटके पाए – जहाँ मेज़बान खुद संकट में हो, वहाँ मेहमान का स्वागत भी वैसा ही दयनीय होता है।
- चार दिन की चाँदनी, फिर अंधेरी रात – सुख का समय बहुत कम दिनों का होता है। सुख थोड़े समय का होना। थोड़े समय की खुशी।
- चूहे के चाम से नगाड़े नहीं मढ़े जाते – सीमित या कम संसाधनों से कोई बड़ा या महान कार्य संपन्न नहीं किया जा सकता। सीमित या ओछे साधनों से बड़े काम कभी पूरे नहीं किए जा सकते।
- छछूंदर के सिर पर चमेली का तेल – किसी अयोग्य या तुच्छ व्यक्ति को कोई बहुत कीमती या ऊँची वस्तु मिल जाना। अयोग्य व्यक्ति को कोई कीमती या अच्छी वस्तु मिल जाना।
- जल में रहकर मगरमच्छ से बैर – अपने क्षेत्र के शक्तिशाली व्यक्ति या आश्रयदाता से दुश्मनी मोल लेना मूर्खता है।
- जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारो – अपनी आय या सामर्थ्य के अनुसार ही खर्च या दिखावा करना चाहिए। आय के अनुसार खर्च करो।
- जौ के साथ घुन भी पिस जाता है – बुरे लोगों की संगति के कारण कभी-कभी निर्दोष व्यक्ति भी सज़ा पा जाता है।
- तन पर नहीं लत्ता, पान खाए अलबत्ता – पास में कुछ न होना पर झूठी शान और शौकत का दिखावा करना।
- तेली का तेल जले, मशालची का पेट फटे- खर्च कोई और करे और तकलीफ या जलन किसी दूसरे व्यक्ति को हो।
- थूका हुआ चाटना – अपनी ही कही बात से पलट जाना या त्यागी हुई वस्तु को दोबारा अपनाना।
- दमड़ी की हांडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई – मामूली नुकसान सहकर किसी व्यक्ति की असलियत या चरित्र का पता लगा लेना।
- दाँत काटी रोटी होना – दो लोगों के बीच बहुत गहरी और घनिष्ठ दोस्ती होना।
- दाल भात में मूसलचंद – दो लोगों के बीच की बातचीत या काम में बिना वजह दखल देना। बिना जरूरत बीच में आने वाला व्यक्ति।
- धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का – जिसका कोई निश्चित ठिकाना या वजूद न हो और वह कहीं का न रहे। जिसका कोई निश्चित ठिकाना या आधार न हो। कहीं का भी न रहना या जिसका कोई ठिकाना न हो।
- नदी नाव संजोग होना – दो लोगों का भाग्यवश या अचानक बहुत थोड़े समय के लिए मिलना। दो लोगों या चीजों का अचानक और दुर्लभ मिलन होना।
- नाई की बारात में ठाकुर ही ठाकुर – जहाँ सभी लोग खुद को बड़ा और प्रधान समझते हों, वहाँ व्यवस्था बिगड़ जाती है।
- नाम बड़े और दर्शन छोटे – प्रसिद्धि बहुत अधिक होना पर वास्तविकता में वैसा कोई गुण न पाना।
- पढ़ा-लिखा पर गुढ़ा नहीं – शिक्षा तो प्राप्त कर लेना पर व्यावहारिक बुद्धि या जीवन का अनुभव न होना।
- पहले पेट पूजा, फिर काम दूजा – सबसे पहले अपनी भूख मिटाना या बुनियादी ज़रूरत पूरी करना, उसके बाद ही कोई दूसरा काम सोचना।
- बंदर के हाथ में नारियल – किसी मूर्ख व्यक्ति को कोई बहुत कीमती या मूल्यवान वस्तु मिल जाना।
- बिल्ली के भागों छींका टूटा – जैसा चाहा था, वैसा ही अचानक काम बन जाना या भाग्य से कोई वस्तु मिल जाना।
- बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना – बेगाना या बाहरी व्यक्ति जिसका मामले से कोई लेना-देना न हो, फिर भी बेवजह उत्साहित होना।
- भगत के बस में हैं भगवान – सच्ची श्रद्धा और प्रेम के आगे शक्तिशाली को भी झुकना पड़ता है।
- भागते चोर की लंगोटी ही सही – नुकसान होते समय जो कुछ भी बच जाए, उसी को लाभ मान लेना चाहिए। जहाँ सब कुछ डूब रहा हो, वहाँ से जो कुछ भी मिल जाए, वही काफी है।
- भूखे भजन न होय गोपाला – खाली पेट या बुनियादी ज़रूरतें पूरी हुए बिना कोई भी बड़ा या आध्यात्मिक काम नहीं किया जा सकता।
- भैंस के आगे बीन बजाना, भैंस खड़ी पगुराए – मूर्ख व्यक्ति के सामने ज्ञान की बातें करना पूरी तरह व्यर्थ है।
- मियाँ की जूती मियाँ के सिर – किसी व्यक्ति की चाल या तरकीब का इस्तेमाल करके उसी को हराना या नुकसान पहुँचाना।
- मुँह माँगी मुराद मिलना – जिसकी इच्छा की थी, वही वस्तु या सफलता मिल जाना।
- मेरी बिल्ली मुझी से म्याऊँ – जिस व्यक्ति को आपने पाल-पोसकर बड़ा किया या सहारा दिया, वही अब आपको आँखें दिखा रहा है।
- मेंढक को भी जुकाम होना – बहुत छोटे या तुच्छ व्यक्ति द्वारा अपनी हैसियत से बढ़कर नखरे दिखाना।
- यथा राजा तथा प्रजा – जैसा देश का नेता या राजा होता है, वैसे ही वहाँ के नागरिक या प्रजा भी आचरण करने लगती है।
- रात गई बात गई – जो समय बीत गया, उसके साथ ही पुरानी कड़वाहट या बातों को भी भूल जाना चाहिए।
- राम नाम जपना पराया माल अपना – ऊपर से ढोंगी साधु बनना पर अंदर से दूसरों का धन हड़पने की नीयत रखना। धार्मिक दिखावे के पीछे स्वार्थ छिपाना।
- रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पी – जो कुछ भी ईमानदारी से मिले, उसी में संतोष करके शांति से जीवन जीना।
- लकीर का फकीर होना – पुरानी रूढ़ियों, परंपराओं या बिना सोचे-समझे किसी पुरानी बात पर अड़े रहना।
- लश्कर में ऊँट बदनाम – गलती या अपराध किसी और का हो, पर बदनामी किसी और की (जो पहले से बदनाम हो) हो जाए।
- लोहा लोहे को काटता है – शक्तिशाली या दुष्ट व्यक्ति को हराने के लिए उसी के जैसे शक्तिशाली साधन की ज़रूरत होती है। ताकतवर या दुष्ट को हराने के लिए वैसी ही कठोर युक्ति अपनानी पड़ती है।
- सयाना कौआ लीद खाता है – जो व्यक्ति खुद को बहुत चालाक समझता है, वह अक्सर सबसे बड़ी मूर्खता कर बैठता है।
- साँच को आँच नहीं – सच्चे और ईमानदार व्यक्ति को किसी भी परीक्षा, डर या नुकसान का भय नहीं होता।
- साँप मरे न लाठी टूटे – इस तरह समझदारी से काम निकालना कि काम भी हो जाए और कोई नुकसान भी न हो।
- साँप का बच्चा सँपोलिया ही होता है – दुष्ट या दुराचारी व्यक्ति की संतान भी अक्सर वैसी ही दुष्ट प्रवृत्ति की होती है।
- सस्ती रोवे बार-बार, मँहगी रोवे एक बार – सस्ती चीज़ जल्दी खराब होती है जिससे बार-बार पैसे लगते हैं, जबकि मँहगी वस्तु लंबे समय तक चलती है।
- सहज पके सो मीठा होए – जो काम धैर्य के साथ और धीरे-धीरे किया जाता है, उसका परिणाम सबसे अच्छा और सुखद होता है।
- साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए – ईश्वर से केवल उतनी ही धन-दौलत की कामना करना जिससे परिवार का भरण-पोषण हो सके।
- सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है – अमीर या सुखी व्यक्ति को लगता है कि दुनिया के सभी लोग बहुत सुखी और संपन्न हैं।
- सिर ओखली में दिया तो मूसलों का क्या डर – जब कोई कठिन या जोखिम भरा काम चुन ही लिया, तो आने वाली मुश्किलों से घबराना बेकार है।
- सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना – कोई नया काम शुरू करते ही तुरंत उसमें कोई बड़ी बाधा या रुकावट आ जाना। शुरुआत में ही विपत्ति आना। काम शुरू होते ही संकट आना।
- सीधी उंगली से घी नहीं निकलता – बहुत ज्यादा सीधा या सीधा-साधा बनने से काम नहीं होता, कभी-कभी कड़ा रुख अपनाना पड़ता है।
- हँसुए के ब्याह में खुरपे का गीत – किसी अवसर या प्रसंग के विपरीत पूरी तरह से असंगत या बेमेल बातें करना।
- हथेली पर सरसों नहीं जमती – कोई भी बड़ा या महत्वपूर्ण काम रातों-रात या तुरंत पूरा नहीं किया जा सकता, उसमें समय लगता है।
- हलाल का खाना और हराम का थूकना – ईमानदारी की कमाई पर जीना और बेईमानी के धन को पूरी तरह से ठुकरा देना।
- हाथ सुमिरनी पेट कतरनी – ऊपर से ईश्वर का नाम लेना और अंदर ही अंदर दूसरों को ठगने की योजना बनाना।
- हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और – कुछ लोगों की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर होता है; बाहर से कुछ, अंदर से कुछ।
- हाथी निकल गया दुम रह गई – किसी बड़े या कठिन कार्य का अधिकांश भाग पूरा हो जाना और बस थोड़ा सा हिस्सा बाकी रहना।
- हारे को हरिनाम – जब इंसान हर तरफ से निराश हो जाता है, तब उसे केवल भगवान का ही सहारा दिखाई देता है।
- हवा का रुख देखना – परिस्थिति या माहौल को भाँपकर उसके अनुसार ही अपना निर्णय या कदम उठाना।
- हल्दी लगी न फिटकरी, रंग चोखा आए – बिना किसी खर्च या विशेष मेहनत के ही बहुत अच्छा परिणाम मिल जाना।
- हँसते के घर बसते – जो लोग खुशमिजाज और मिलनसार होते हैं, उनका परिवार और जीवन हमेशा सुखी रहता है।
- हक नाहक का झगड़ा – बिना किसी ठोस वजह या बिना किसी कारण के आपस में विवाद करना।
- अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग – संगठन में तालमेल न होना और हर व्यक्ति का अपनी मनमर्जी के मुताबिक काम करना।
- अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे – अधिकार मिलने पर केवल अपने सगे-संबंधियों या करीबियों को ही लाभ पहुँचाना।
- अटकल पच्चू डेढ़ सौ – बिना किसी नियम या योजना के, अंदाज़े से कोई भी काम करना।
- अनमांगा धन देवता बराबर – बिना माँगे जो मदद या धन मिल जाए, वह बहुत पवित्र और मूल्यवान होता है।
- अन्त भले का भला – अच्छे काम का अंतिम परिणाम हमेशा अच्छा ही होता है।
- अपनी खाल में मस्त रहना – अपनी सीमित परिस्थितियों में ही संतुष्ट और खुश रहना।
- अशर्फी की लूट और कोयले पर छाप – मूल्यवान चीज़ों को बर्बाद होने देना और सस्ती चीज़ों की कड़ाई से रक्षा करना।
- आँख का अंधा गाँठ का पूरा – बुद्धिहीन व्यक्ति जिसके पास बहुत अधिक धन-दौलत हो।
- आग खाएगा सो अंगार उगलेगा – जो व्यक्ति बुरे काम करेगा, उसे उसका परिणाम भी बुरा ही भुगतना पड़ेगा।
- आग लगने पर कुआँ खोदना – विपत्ति आ जाने के बाद उससे बचने का उपाय सोचना या तैयारी करना।
- आटा निहारे सो बनिया – जो व्यक्ति हर छोटी-छोटी चीज़ का बहुत बारीकी से हिसाब रखता है।
- आधा तीतर आधा बटेर – दो बेमेल चीज़ों का मिश्रण होना, जिसका कोई निश्चित रूप या स्वरूप न हो।
- आप डूबे तो जग डूबा – जो व्यक्ति खुद नष्ट हो जाता है, उसे लगता है कि पूरी दुनिया ही बर्बाद हो गई है।
- आम खाने से काम या पेड़ गिनने से – अपने मुख्य उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए, व्यर्थ की बातों में समय खराब नहीं करना चाहिए।
- इतने से पेट नहीं भरता – बहुत कम मात्रा में मिली वस्तु से बड़ी ज़रूरत पूरी न होना।
- इशारे में बात समझना – बुद्धिमान व्यक्ति ज़रा से संकेत से ही पूरी बात समझ जाता है।
- ईंट का जवाब पत्थर से देना – दुष्ट या शत्रु को उसकी दुष्टता का उससे भी बढ़कर करारा जवाब देना। कड़ा प्रतिकार करना।
- उलटे बांस बरेली को – जहाँ जिस वस्तु की पहले से बहुतायत हो, वहाँ उसी वस्तु को दोबारा भेजना (विपरीत काम करना)। उलटा या असामान्य काम करना।
- ऊँची दुकान फीका पकवान – केवल बाहरी दिखावा बहुत अच्छा होना, जबकि वास्तविकता में कोई गुण न होना। दिखावा अधिक, गुणवत्ता कम।
- एक आँख से देखना – सबको समान दृष्टि से देखना, किसी के साथ भेदभाव न करना।
- एक तवे की रोटी, क्या छोटी क्या मोटी – एक ही परिवार या समूह के सभी सदस्यों का एक समान होना।
- एक पंथ दो काज – एक ही साधन या प्रयास से दो बड़े काम एक साथ पूरे कर लेना। एक काम से दो लाभ। एक ही प्रयास या रास्ते से दो बड़े काम सिद्ध कर लेना।
- ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती – बहुत बड़ी ज़रूरत को पूरा करने के लिए अत्यंत अल्प साधन नाकाफ़ी होते हैं। थोड़े से साधन से बड़ी आवश्यकता पूरी नहीं होती।
- कढ़ते-कढ़ते बात बढ़ती है – बहस या विवाद को जितना खींचा जाए, वह उतना ही बढ़ता चला जाता है।
- कमली ओढ़ने से कोई साधु नहीं होता – केवल बाहरी भेष बदल लेने से कोई व्यक्ति महात्मा या सज्जन नहीं बन जाता।
- कर ले सो काम, भज ले सो राम – जो काम हाथ में है उसे तुरंत पूरा कर लेना चाहिए और ईश्वर का स्मरण करना चाहिए।
- करे कोई भरे कोई – गलती या अपराध कोई एक व्यक्ति करे और उसकी सज़ा किसी निर्दोष को भुगतनी पड़े।
- कौआ चला हंस की चाल, अपनी भी भूला – दूसरों की देखा-देखी करने के चक्कर में अपनी मूल योग्यता या पहचान भी खो देना। नकल में अपनी पहचान खोना।
- गंगा नहाए क्या, जो मन मैला होए – यदि मन में पाप या खोट है, तो बाहरी पवित्रता या तीर्थ यात्रा पूरी तरह व्यर्थ है।
- गाँठ का पूरा, मति का अधूरा – धनी व्यक्ति जो स्वभाव से अत्यंत मूर्ख हो।
- गुड़ खाए, गुलगुलों से परहेज – किसी बड़ी बुराई को तो आसानी से स्वीकार कर लेना, पर छोटी सी बात का ढोंग रचना। छोटी बात स्वीकार, बड़ी से परहेज। एक बात स्वीकार कर दूसरी से बचना।
- गुड़ न दे तो गुड़ जैसी बात तो करे – यदि आप किसी की आर्थिक या भौतिक मदद नहीं कर सकते, तो कम से कम मीठे बोल तो बोलें।
- घी कहाँ गिरा? खिचड़ी में – नुकसान होने पर भी वह धन अपनों या अपनों के काम में ही आ जाना।
- घोड़ा घास से यारी करे तो खाए क्या – अपने पेशे या काम में अत्यधिक शर्म या लिहाज करने से अपना ही नुकसान होता है।
- छोटे मियाँ सो छोटे मियाँ, बड़े मियाँ सुभानअल्लाह – छोटा तो शरारती या चालाक है ही, बड़ा उससे भी दो कदम आगे है।
- जबरदस्ती का सौदा नहीं होता – किसी भी काम या रिश्ते में किसी के साथ ज़ोर-जबरदस्ती नहीं की जा सकती।
- ज़र का ज़ोर पूरा है -दुनिया में धन-दौलत की ताकत सबसे बड़ी होती है, इससे कई काम बन जाते हैं।
- जान बची तो लाखों पाए – संकट के समय धन-दौलत छोड़कर यदि जान बच जाए, तो वही सबसे बड़ा लाभ है।
- जिसका काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे – जो व्यक्ति जिस काम में निपुण है, उसे वही काम करना चाहिए; दूसरा करेगा तो नुकसान होगा।
- जोगी जुगत जानी नहीं, कपड़े रंगे तो क्या हुआ – वास्तविक ज्ञान या साधना के बिना केवल गेरुआ वस्त्र धारण करना व्यर्थ है। बाहरी भेष बदल लेने से आंतरिक ज्ञान या गुण नहीं आते।
- टका मारना – बहुत कम पैसे के लिए किसी का बड़ा नुकसान कर देना।
- तबेले की बला बंदर के सिर – किसी एक का अपराध या आफ़त किसी दूसरे बेकसूर के सिर मढ़ देना।
- नेकी और पूछ-पूछ – भलाई का काम करने के लिए किसी से अनुमति या राय लेने की आवश्यकता नहीं होती।
- बाप भला न भैया, सबसे बड़ा रुपैया – आज के समय में रिश्तों-नातों से बढ़कर धन-दौलत को ही सबसे बड़ा माना जाता है। धन का प्रभाव अधिक।
- बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे – कठिन या जोखिम भरे काम की शुरुआत करने का साहस कौन दिखाए। कठिन काम की जिम्मेदारी कौन ले।
- अपनी टांग उघारिए, आप ही मरिए लाज – अपने घर या परिवार की गुप्त बातें दूसरों के सामने खोलने से खुद की ही बदनामी होती है।
- अंगूर खट्टे हैं – जब कोई वस्तु प्रयास करने पर भी न मिले, तो उसमें कमी निकाल देना।
- अंडे सेवे कोई, बच्चे लेवे कोई – मेहनत कोई और करे और उसका फल या लाभ किसी दूसरे को मिल जाए।
- आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक – वैरागी या धुन के पक्के व्यक्ति का अपनी ही धुन में सब कुछ त्याग देना।
- आग बिना धुआँ नहीं होता – हर अफ़वाह या घटना के पीछे कोई न कोई छोटा या बड़ा कारण ज़रूर होता है।
- आसमान से गिरा, खजूर पर अटका – एक मुसीबत से निकलकर तुरंत दूसरी नई मुसीबत में फँस जाना। एक संकट से निकलकर दूसरे में फँसना।
- इतने बड़े हो गए, पर अक्ल न आई – उम्र बढ़ जाने पर भी समझदारी या व्यावहारिक ज्ञान का न होना।
- इंद्रायण का फल, ऊपर से सुंदर भीतर से कड़वा – कोई ऐसी वस्तु या व्यक्ति जो बाहर से बहुत आकर्षक हो पर अंदर से बहुत घटिया हो।
- उधार दीजिए, दुशमन कीजिए – किसी को उधार देना अक्सर अंत में दुश्मनी मोल लेने जैसा साबित होता है।
- एक तंदुरुस्ती, हज़ार नियामत – अच्छा स्वास्थ्य दुनिया की सबसे बड़ी दौलत या वरदान है।
- ओछे की प्रीत, बालू की भीत – ओछे या नीच व्यक्ति की दोस्ती रेत की दीवार की तरह होती है, जो कभी भी टूट सकती है।
- कब्र में पाँव लटकना – मृत्यु के बहुत करीब होना या अत्यधिक वृद्ध हो जाना।
- कलवार की दुकान पर पानी भी पियो, तो लोग शराब ही समझते हैं – बदनामी वाली जगह पर जाकर यदि आप कोई अच्छा काम भी करें, तो लोग आप पर शक ही करेंगे।
- कुम्हार अपना ही घड़ा सराहता है – हर व्यक्ति को अपनी बनाई हुई वस्तु या अपनी संतान ही सबसे अच्छी लगती है।
- कोढ़ में खाज होना – एक मुसीबत के ऊपर दूसरी और कष्टदायक मुसीबत का आ जाना।
- खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर, कटना खरबूजे को ही है – कमज़ोर और ताकतवर की लड़ाई में नुकसान हमेशा कमज़ोर का ही होता है।
- गाछ (पेड़) पर कटहल, होंठ पर तेल – काम पूरा होने से पहले ही उसके फल को भोगने की तैयारी या योजना बना लेना।
- गुड़ दिए मरे, तो ज़हर क्यों दे – यदि कोई काम मीठी बातों या प्यार से निकल सकता है, तो वहाँ कड़वाहट या कड़ाई करने की ज़रूरत नहीं है।
- गीदड़ की मौत आती है, तो वह शहर की तरफ भागता है – जब किसी व्यक्ति का बुरा समय आता है, तो वह जानबूझकर विनाशकारी फैसले लेता है।
- घायल की गति घायल जाने – जिसने खुद कष्ट झेला हो, वही दूसरे के दुःख और दर्द को असलियत में समझ सकता है।
- चोर को कहें चोरी करने को और शाह को कहें जागते रहने को – दो पक्षों को आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने वाले दुधमुँहे लोग।
- छाज बोले सो बोले, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद – जिसके खुद के चरित्र में हज़ारों कमियाँ हों, उसका दूसरों की छोटी सी कमी पर उंगली उठाना हास्यास्पद है।
- जली रस्सी भी बल नहीं छोड़ती – पुराना रसूख या ताकत चले जाने पर भी इंसान का पुराना घमंड कम नहीं होता।
- जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि – कवियों की कल्पना शक्ति असीमित होती है, वे वहाँ भी सोच लेते हैं जहाँ सूरज की किरणें भी नहीं पहुँच पातीं। कवि की कल्पना बहुत असीमित होती है, वह कहीं भी सोच सकता है।
- जितना गुड़ डालोगे, उतना ही मीठा होगा – आप किसी काम में जितनी अधिक मेहनत या पैसा लगाएँगे, उसका परिणाम उतना ही बेहतर होगा। जितना प्रयास, उतना परिणाम।
- जिस कुएँ का पानी पिया, उसी में ईंट डालना – जिससे लाभ उठाया या जिसका उपकार लिया, अंत में उसी का बुरा करना।
- टका रोवे अपनी साख को, टकिया रोवे अपनी धाक को – अमीर अपनी प्रतिष्ठा के लिए डरता है और गरीब अपनी रोटी के लिए।
- टके की बुढ़िया, टका सिर मुँड़ाई – किसी तुच्छ काम को पूरा करने के लिए उसकी असल कीमत से ज़्यादा का खर्च कर देना।
- ठंडा लोहा गर्म लोहे को काट देता है – शांत स्वभाव का व्यक्ति क्रोधी और उग्र व्यक्ति को आसानी से शांत या परास्त कर देता है।
- डाइन भी दामाद को छोड़ देती है – दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति भी अपने करीबियों या रिश्तेदारों का नुकसान करने से बचता है।
- तेल की कड़ाई में हाथ डालना – कोई बहुत बड़ा जोखिम या परीक्षा मोल लेना।
- थूक से सत्तू नहीं सनता – केवल बड़ी-बड़ी बातों से काम नहीं होते, काम पूरा करने के लिए संसाधनों और मेहनत की ज़रूरत होती है।
- दरिया में रहना और मगरमच्छ से बैर – जहाँ रहना हो, वहाँ के शक्तिशाली लोगों से दुश्मनी करना मूर्खता है।
- दाम बनावे काम – पैसे के बल पर दुनिया के अधिकांश कठिन काम आसान हो जाते हैं।
- दिन ढले मुसाफ़िर भूले – वृद्धावस्था या बुरा समय आने पर बुद्धि और साथी भी साथ छोड़ देते हैं।
- देसी कुतिया विलायती बोली – अपनी मूल संस्कृति या भाषा को छोड़कर बनावटीपन या विदेशी संस्कृति की नकल करना।
- नाई की दाढ़ी में सब उस्ताद – कमज़ोर या नौसिखिए के काम में हर कोई अपनी राय देकर बड़ा बनने की कोशिश करता है।
- नेकी कबर तक साथ देती है – इंसान के अच्छे कर्म उसकी मृत्यु के बाद भी उसका नाम अमर रखते हैं।
- पका धान देख मन नाचे – सफलता या लाभ को बिल्कुल नज़दीक देखकर मन का अत्यधिक प्रसन्न होना।
- पराई आस सदा निरास – दूसरों के भरोसे रहने वाले व्यक्ति को हमेशा अंत में निराशा ही हाथ लगती है।
- पानी में आग लगाना – शांत माहौल में जानबूझकर कलह, झगड़ा या अशांति पैदा करना।
- बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभानअल्लाह – जब छोटा व्यक्ति अपने बड़ों से भी दो कदम आगे निकलकर चतुराई या शरारत दिखाए। छोटा व्यक्ति बड़े से भी दो कदम आगे (अवगुणों में) होना।
- बिच्छू का मंत्र न जाने, साँप के बिल में हाथ डाले – बिना किसी काम की योग्यता या जानकारी के, बहुत बड़े जोखिम में कूद पड़ना। योग्यता न होने पर भी बहुत बड़े जोखिम वाले काम में कूद पड़ना।
- बोए आम, जमे बबूल – उम्मीद बहुत अच्छी चीज़ की करना पर हाथ में कड़वा परिणाम लगना।
- मुफ़्त की शराब काज़ी को भी हलाल – मुफ़्त में मिलने वाली चीज़ को कोई भी नहीं छोड़ता, चाहे वह कितनी ही असंगत क्यों न हो।
- नीम हकीम खतरा-ए-जान – अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है।
- खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे – लज्जित या असफल होने पर दूसरों पर गुस्सा निकालना। असफल व्यक्ति झुँझलाहट में दूसरों पर क्रोध करे। अपनी असफलता या शर्म को छिपाने के लिए दूसरों पर बेवजह गुस्सा करना।
- ऊँट के मुँह में जीरा – बहुत बड़ी जरूरत के लिए बहुत कम वस्तु का मिलना। ज़रूरत के मुकाबले बहुत कम वस्तु मिलना।
- चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाय – अत्यधिक कंजूस होना।
- पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं – किसी के होनहार होने के लक्षण बचपन में ही पता चल जाते हैं।
- बगले भगत होना – भीतर से कपटी और बाहर से साधु जैसा व्यवहार करना।
- बासी बचे न कुत्ता खाय – उतना ही बनाना जितना खर्च हो जाए, कुछ भी व्यर्थ न जाना।
- मूर्ख को उपदेश देना, मानो ज्ञान खोना – समझहीन व्यक्ति को समझाना समय की बर्बादी है।
- मान न मान, मैं तेरा मेहमान – जबरदस्ती किसी के गले पड़ना।
- पढ़े न लिखे, नाम विद्यासागर – गुण कुछ न होना पर नाम बहुत बड़ा रख लेना।
- लिखे ईसा, पढ़े मूसा – बहुत ही गंदी और अस्पष्ट लिखावट होना।
- अंधा क्या चाहे, दो आँखें – मनचाही वस्तु का अनायास ही मिल जाना।
- टका सा जवाब देना – साफ-साफ मना कर देना। किसी बात के लिए साफ़ और सीधे शब्दों में मना कर देना।
- जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी दीजै – समय और परिस्थिति के अनुसार ही अपना रुख बदलना चाहिए।
- तीन लोक से मथुरा न्यारी – सबसे अलग और निराला व्यवहार या दृष्टिकोण होना। किसी व्यक्ति या वस्तु का सबसे अलग, अनोखा या विचित्र होना।
- दुधारू गाय की लात भी सहनी पड़ती है – लाभ देने वाले व्यक्ति की कड़वी बातें भी बर्दाश्त करनी पड़ती हैं।
- न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी – झगड़े की जड़ को ही पूरी तरह से खत्म कर देना। समस्या की जड़ समाप्त करना। मुसीबत या झगड़े की जड़ को ही पूरी तरह से खत्म कर देना।
- कर भला तो हो भला – दूसरों का अच्छा करने वाले के साथ हमेशा अच्छा ही होता है।
- जाको राखे साइयां, मार सके न कोय – ईश्वर जिसकी रक्षा करता है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जिसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं, उसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।
- कादर मन कहुँ एक अधारा, दैव दैव आलसी पुकारा – केवल कायर और आलसी लोग ही भाग्य के भरोसे बैठते हैं।
- मन चंगा तो कठौती में गंगा – यदि मन शुद्ध और पवित्र है, तो घर पर ही सारे तीर्थ हैं।
- सांच को आँच नहीं – सच्चे और ईमानदार व्यक्ति को किसी भी बात का डर नहीं होता।
- सेवा बिन मेवा नहीं मिलता – बिना कठिन परिश्रम या सेवा के कोई अच्छा फल प्राप्त नहीं होता।
- होनहार बिरवान के होत चीकने पात – प्रतिभाशाली व्यक्तियों के लक्षण शुरुआत से ही दिखने लगते हैं।
- भाग्य के लिखे को कौन बदल सकता है – जो नियति में तय है, उसे टाला नहीं जा सकता।
- दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय – लोग मुसीबत में ही ईश्वर को याद करते हैं, अच्छे दिनों में भूल जाते हैं।
- सब दिन होत न एक समाना – समय हमेशा बदलता रहता है, परिस्थितियाँ कभी एक जैसी नहीं रहतीं।
- आँख का अंधा नाम नयनसुख – गुणों के बिल्कुल विपरीत नाम होना।
- इतने से तो दाल भी नहीं सीझती – बहुत कम साधनों से बड़ा काम पूरा नहीं हो सकता।
- ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया – भगवान की लीला विचित्र है, कोई बहुत अमीर है तो कोई बहुत गरीब।
- कहे से धोबी गधे पर नहीं चढ़ता – कहने मात्र से कोई जिद्दी व्यक्ति अपना हठ नहीं छोड़ता।
- कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा – अनमेल और अलग-अलग चीजों को जोड़कर कुछ बनाना।
- कोयले की दलाली में हाथ काले – बुरों की संगति या बुरे काम में रहने से बदनामी ही मिलती है। बुरे काम का साथ करने से बदनामी तय है।
- जिसकी लाठी उसकी भैंस – समाज में ताकतवर व्यक्ति की ही बात मानी जाती है। शक्तिशाली व्यक्ति का ही सब कुछ होता है। शक्तिशाली का अधिकार चलता है।
- जैसी आत्मा वैसी परमात्मा – जैसा इंसान खुद होता है, उसे दुनिया भी वैसी ही नजर आती है।
- डूबते को तिनके का सहारा – संकट में पड़े व्यक्ति को मिलने वाली थोड़ी सी मदद भी बहुत बड़ी होती है। संकट में छोटी मदद भी बड़ी लगती है।
- घर का भेदी लंका ढाए – आपसी फूट या घर का कोई करीबी व्यक्ति ही सबसे बड़ा नुकसान पहुँचाता है। अपना व्यक्ति ही सबसे बड़ा नुकसान कर सकता है।
- खग जाने खग ही की भाषा – एक जैसे स्वभाव वाले लोग ही एक-दूसरे की बात आसानी से समझ पाते हैं। समान स्वभाव वाले एक-दूसरे को समझते हैं।
- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता – कोई भी बड़ा और कठिन कार्य एक अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता।
- अंधी पीसे कुत्ता खाय – कमाने वाला कोई लापरवाह हो और उसका लाभ कोई अयोग्य उठा रहा हो।
- आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास – किसी बड़े और मुख्य उद्देश्य को छोड़कर छोटे कामों में लग जाना।
- एक अनार सौ बीमार – चीज एक ही हो और उसे पाने की इच्छा रखने वाले बहुत सारे लोग हों। चाहने वाले बहुत, वस्तु कम।
- कढ़ाई से गिरा, चूल्हे में पड़ा – एक छोटी परेशानी से बचकर उससे भी बड़ी परेशानी में जा गिरना।
- काजी जी दुबले क्यों, शहर के अंदेशे से – दूसरों की चिंता में बेवजह खुद को परेशान करना।
- कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती – दुष्ट व्यक्ति अपना मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता।
- कोउ नृप होइ हमें का हानी – सरकार या राजा कोई भी बने, आम और उदासीन व्यक्ति को कोई फर्क नहीं पड़ता।
- चिड़िया चूंक गई खेत, फिर पछताए होत क्या – समय निकल जाने के बाद अफसोस करने का कोई फायदा नहीं होता।
- जसोदा हरि पालने झुलावै – अपनों के प्रति अत्यधिक वात्सल्य और प्रेम प्रदर्शित करना।
- जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई – जिसने खुद कभी दुख न झेला हो, वह दूसरों का दर्द नहीं समझ सकता। अनुभव के बिना दूसरे का दुख नहीं समझना।
- जितनी चादर हो, उतने ही पैर फैलाने चाहिए – अपनी आय और औकात के अनुसार ही खर्च या दिखावा करना चाहिए। साधन के अनुसार खर्च।
- टुकड़े चबाना और मस्त रहना – जो कुछ भी थोड़ा-बहुत रूखा-सूखा मिले, उसी में संतोष कर लेना।
- डैन डायन भी एक घर छोड़ती है – दुष्ट व्यक्ति भी अपने बिल्कुल सगे-संबंधियों का थोड़ा लिहाज रखता है।
- तेंदुए के बच्चे को तैरना कौन सिखाए – जन्मजात प्रतिभा वाले को सिखाने की जरूरत नहीं होती।
- दमड़ी की बुढ़िया, टका सिर मुड़ाई – सस्ती चीज की मरम्मत या देखरेख में उससे ज्यादा पैसा खर्च कर देना।
- दीवारों के भी कान होते हैं – गोपनीय बातें करते समय बहुत सावधान रहना चाहिए, वे लीक हो सकती हैं।
- दूर के ढोल सुहावने लगते हैं – दूर से देखने पर हर परिस्थिति या चीज अच्छी ही नजर आती है।
- नया नौ दिन, पुराना सौ दिन – नई चीजें थोड़े दिन अच्छी लगती हैं, पर पुरानी चीजें ही टिकाऊ और भरोसेमंद होती हैं। पुराने मित्र, अनुभव और वस्तुएं ही संकट में काम आती हैं।
- नीम न मीठा होय, चाहे सींचो घी-गुड़ से – दुष्ट व्यक्ति को चाहे जितना सुधारो, उसका मूल स्वभाव नहीं बदलता।
- माया को माया मिले, कर-कर लंबे हाथ – धनी व्यक्ति को ही हर तरफ से और धन या लाभ मिलता है।
- मुफ्त की शराब तो काजी को भी हलाल – बिना पैसे के मिलने वाली चीज का लालच हर कोई कर बैठता है।
- मुख में राम, बगल में छुरी – सामने बहुत मीठी बातें करना और पीठ पीछे नुकसान पहुँचाने की योजना बनाना।
- रस्सी का सांप बनना – किसी बहुत छोटी सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर बड़ा बतंगड़ बना देना।
- लंगड़ी लोमड़ी अंगूर खट्टे बताती है – जब कोई चीज न मिले, तो उसमें कमियाँ निकालना शुरू कर देना।
- लूट में चरखा नफा – जहाँ सब कुछ लुट रहा हो, वहाँ जो थोड़ा बहुत भी बच जाए वही लाभ है।
- शठे शाठ्यं समाचरेत् – दुष्ट व्यक्ति के साथ हमेशा दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए।
- सब धान बाईस पसेरी – अच्छे और बुरे, गुणी और मूर्ख सबको एक ही तराजू में तौलना।
- समरथ को नहिं दोषु गुसाईं – शक्तिशाली या समर्थ व्यक्ति की गलतियों को भी लोग अनदेखा कर देते हैं।
- सैयां भए कोतवाल, अब डर काहे का – जब अपना ही कोई करीबी ऊंचे पद पर हो, तो किसी का भय नहीं रहता। अपनों के ऊँचे पद पर होने के कारण गलत कामों का डर खत्म हो जाना।
- हंसुआ के ब्याह में खुरपी का गीत – किसी विशेष अवसर पर बिल्कुल असंगत या बेतुकी बातें करना।
- हाथी घूम जाए पर दुम अटक जाए – पूरा बड़ा काम आसानी से हो जाना पर अंत में जरा सी बात पर काम रुक जाना।
- क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात – बड़ों को हमेशा क्षमा शोभा देती है और छोटों का काम चंचलता करना है। बड़ों का बड़प्पन क्षमा करने में है, जबकि छोटों का स्वभाव शरारत करना होता है।
- अंधी नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा – जहाँ का शासन मूर्खतापूर्ण हो, वहाँ न्याय-अन्याय सब बराबर होता है।
- अटका बनिया देवे उधार – जब व्यक्ति खुद मजबूरी में फँसता है, तब वह न चाहते हुए भी बात मान जाता है।
- आम खाने से काम है या पेड़ गिनने से – काम की बात से मतलब रखना चाहिए, व्यर्थ की बातों में समय नहीं गँवाना चाहिए।
- आसमान पर थूका मुँह पर गिरता है – महापुरुषों या बड़ों की निंदा करने से खुद की ही बदनामी होती है। दूसरों की निंदा अंततः स्वयं पर आती है।
- इमली के पात पर दंड पेलना – सीमित साधनों में बड़े-बड़े काम करने का झूठा दिखावा करना।
- ऊंची दुकान फीका पकवान – केवल बाहरी तड़क-भड़क होना, जबकि असलियत में कोई गुण न होना।
- एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी – एक तो गलत काम करना और पकड़े जाने पर उल्टा अकड़ दिखाना। गलती करके अकड़ दिखाना।
- कब्र में पाँव लटके होना – मृत्यु के बहुत करीब होना, वृद्धावस्था के अंतिम दौर में होना।
- करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े – भाग्यहीन व्यक्ति जो भी काम शुरू करता है, उसमें नुकसान ही होता है। भाग्यहीन व्यक्ति जो भी काम शुरू करता है, उसमें कोई न कोई नुकसान हो ही जाता है।
- कागा चले हंस की चाल, अपनी भी भूला – दूसरों की अंधी नकल करने के चक्कर में अपना मूल स्वरूप भी खो देना।
- काटो तो खून नहीं – अत्यधिक भयभीत या स्तंभित रह जाना।
- किस्मत की लाठी में आवाज नहीं होती – जब ईश्वर का न्याय या भाग्य की मार पड़ती है, तो पता नहीं चलता।
- कोई गावे सावन, कोई गावे भादों – दो लोगों के विचारों में बिल्कुल भी तालमेल न होना।
- जस दूल्हा तस बनी बराता – जैसा मुख्य व्यक्ति या नेता होता है, उसके साथी भी वैसे ही होते हैं।
- जादू वही जो सिर चढ़कर बोले – उपाय या प्रभाव वही श्रेष्ठ है जिसे विरोधी भी मानने पर मजबूर हो जाएं।
- जिस थाली में खाना, उसी में छेद करना – जिससे लाभ या आश्रय पाना, उसी का नुकसान करना (कृतघ्नता)। उपकार करने वाले से विश्वासघात करना। उपकार करने वाले व्यक्ति के साथ ही विश्वासघात या गद्दारी करना।
- झूठ के पाँव नहीं होते – झूठ ज्यादा दिन तक टिक नहीं सकता, वह जल्द ही पकड़ा जाता है।
- टूटा फूटा घर भी महल जैसा लगता है – अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी या घर भी इंसान को सबसे प्रिय होता है।
- ठंडा लोहा गर्म लोहे को काटता है – शांत और धैर्यवान व्यक्ति क्रोधी व्यक्ति को आसानी से हरा देता है।
- तंदुरुस्ती हजार नियामत है – अच्छा स्वास्थ्य दुनिया की सबसे बड़ी दौलत और सुख है।
- तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पान – परोपकारी लोग अपनी संपत्ति का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करते हैं।
- तलवार का घाव भर जाता है, बात का नहीं – कड़वी बातों का घाव दिल पर हमेशा रहता है, उसे भूलना मुश्किल है।
- तुरंत दान महा कल्याण – किसी अच्छे या पुण्य के काम को बिना देरी किए तुरंत कर देना चाहिए।
- तेली का तेल जले, मशालची का दिल दुखे – खर्च मालिक का हो रहा हो और दर्द किसी तीसरे बाहरी व्यक्ति को हो।
- थूक कर चाटना – अपनी बात से पलट जाना, जो कि मर्यादा के खिलाफ है।
- दाम बनाए काम – पैसा खर्च करने से बिगड़े हुए और कठिन काम भी आसानी से बन जाते हैं।
- दामाद भी कभी बेटा नहीं हो सकता – बाहरी व्यक्ति को चाहे जितना अपनाओ, वह पूरी तरह सगा नहीं बनता।
- दीपक के नीचे अंधेरा – दूसरों को रास्ता दिखाने वाले के अपने जीवन में ही कमियाँ होना।
- देखें ऊँट किस करवट बैठता है – इंतजार करना कि किसी अनिश्चित परिस्थिति का अंतिम परिणाम क्या निकलता है।
- दौड़कर कुएं में गिरना – जानबूझकर खुद को किसी बड़ी मुसीबत में ढकेल देना।
- धन का धनी, मन का दरिद्री – अमीर तो होना पर दिल से बेहद संकुचित और कंजूस होना।
- नदी किनारे का पेड़ कभी भी गिर सकता है – अस्थिर या संकटपूर्ण स्थिति में रहने वाली चीज का जीवन कम होता है।
- नाहर भी कभी घास खाता है – स्वाभिमानी व्यक्ति चाहे जितनी गरीबी में हो, वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।
- निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय – कमियाँ बताने वाले को पास रखना चाहिए ताकि खुद में सुधार किया जा सके।
- नौ की लकड़ी नब्बे का खर्च – किसी सामान्य वस्तु को सँभालने में बहुत ज्यादा खर्च कर देना।
- पका पेड़ कभी भी गिर सकता है – वृद्ध व्यक्ति का जीवन अनिश्चित होता है।
- पंचों का कहा सिर माथे, पर खूंटा वहीं गड़ेगा – सबकी सलाह सुनना पर अंत में अपनी ही जिद पर अड़े रहना।
- पक्षी को आकाश ही सुहाता है – हर जीव को अपनी स्वतंत्रता सबसे प्यारी होती है।
- पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं – गुलामी या दूसरों के अधीन रहने वाले को सपने में भी सुख नहीं मिलता।
- पहले लिख और पीछे दे, भूल पड़े तो कागज से ले – लेन-देन के मामलों में हमेशा लिखित हिसाब रखना चाहिए।
- पाँचों उंगलियाँ घी में होना – सब तरफ से लाभ ही लाभ होना, ऐशो-आराम की जिंदगी होना। चारों तरफ से केवल लाभ ही लाभ मिलना या हर तरह से सुख-सुविधा होना।
- पानी पीकर जात पूछना – काम पूरा हो जाने के बाद उसके औचित्य या नियमों के बारे में सोचना।
- पापी का माल अकारथ जाए – गलत तरीके से कमाया हुआ धन हमेशा बुरे कामों में ही नष्ट होता है।
- प्यासा कुएं के पास जाता है, कुआं प्यासे के पास नहीं – जिसे जरूरत होती है, उसे ही प्रयास करना पड़ता है।
- फिसल पड़े तो हर गंगा – मजबूरी में किसी काम को मजबूरी न बताकर पुण्य का कार्य घोषित कर देना। मजबूरी में किए गए काम को अपनी इच्छा से किया गया महान कार्य बताना।
- बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी – अपराधी या पापी एक न एक दिन जरूर पकड़ा जाता है।
- बद अच्छा, बदनाम बुरा – समाज में बुरी शोहरत होना, सीधे बुरे होने से भी ज्यादा नुकसानदेह है।
- बन जाए तो अमीर, नहीं तो फकीर – किसी अनिश्चित काम में पूरी ताकत लगाना, सफल हुए तो ठीक वरना जैसे हैं वैसे ही।
- बहती गंगा में हाथ धोना – समय का फायदा उठाकर अपना भी कोई अटका हुआ काम निकाल लेना।
- बारह बरस में घूरे के दिन भी बदलते हैं – एक न एक दिन गरीब या छोटे व्यक्ति का भाग्य भी जरूर चमकता है।
- बिना रोए तो माँ भी दूध नहीं पिलाती – बिना मांगे या बिना प्रयास किए हक की चीज भी नहीं मिलती।
- बेकार से बेगार भली – चुपचाप खाली बैठने से बेहतर है कि बिना पैसे का ही कुछ काम कर लिया जाए।
- बोले सो निहाल – जो ईश्वर या सत्य का साथ देता है, वही हमेशा प्रसन्न रहता है।
- भरी थाली में लात मारना – अपनी अच्छी-भली नौकरी, आजीविका या लाभ को खुद ही लात मारकर छोड़ देना।
- मक्खी चूस होना – अत्यधिक कंजूस होना, जो पैसे के लिए कुछ भी कर सके।
- मछली का बच्चा कभी तैरना नहीं सीखता – जन्मजात गुणी को अलग से ट्रेनिंग देने की जरूरत नहीं होती।
- मरता क्या न करता – मुसीबत में फँसा इंसान अपनी जान बचाने के लिए हर तरह का सही-गलत कदम उठाता है।
- मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी – जब दो मुख्य पक्ष आपस में सहमत हों, तो किसी तीसरे के विरोध का महत्व नहीं रहता।
- मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त – जिसका काम है वह तो शांत है, पर बाहरी लोग उसके लिए ज्यादा परेशान हैं।
- मुँह में राम बगल में छुरी – कपटी मित्र जो सामने अच्छा और पीठ पीछे बुरा हो। ऊपर से मित्र बनकर रहना और अंदर से दुश्मनी रखना।
- मेहनत का फल मीठा होता है – कठिन परिश्रम का परिणाम हमेशा सुखद और लाभदायक होता है।
- रहीम देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि – बड़ी चीज या अमीर दोस्त मिलने पर छोटे दोस्तों को नहीं छोड़ना चाहिए।
- राई का पहाड़ बनाना – बहुत छोटी सी बात को बढ़ा-चढ़ाकर बहुत बड़ा विवाद बना देना।
- राम मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी – दो बिल्कुल एक जैसे अवगुणी या अजीब लोगों का साथ होना।
- लातों के भूत बातों से नहीं मानते – दुष्ट और नीच लोग समझाने से नहीं, बल्कि दंड देने से ही सुधरते हैं। कुछ लोग कठोरता से ही समझते हैं।
- लोभ पाप का मूल है – लालच ही इंसान से सारे गलत और पापी काम करवाता है।
- वक्त पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है – मुसीबत के समय स्वार्थ सिद्ध करने के लिए मूर्ख की भी खुशामद करनी पड़ती है।
- विनाशकाले विपरीत बुद्धि – बुरा समय आने पर इंसान की सोचने-समझने की शक्ति सबसे पहले नष्ट हो जाती है। बुरे समय में बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।
- शर्म की कश्ती हमेशा डूबती है – अत्यधिक संकोच करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में प्रगति नहीं कर पाता।
- शुभस्य शीघ्रम् – किसी भी अच्छे और कल्याणकारी काम को करने में देरी नहीं करनी चाहिए।
- संतोषं परमं सुखम् – जीवन में जितना मिला है उतने में संतुष्ट रहना ही सबसे बड़ा सुख है।
- सयाना कौआ हमेशा गंदगी पर गिरता है – चालाक व्यक्ति भी कभी-कभी अपनी अति-चतुराई के कारण बड़ी मूर्खता कर बैठता है।
- सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं – परिस्थितियाँ हमेशा बदलती रहती हैं, स्थायी कुछ भी नहीं।
- सूरज को दीपक दिखाना – बहुत बड़े और प्रसिद्ध व्यक्ति का परिचय देना या उसकी तारीफ करना। ज्ञानी को ज्ञान देना। किसी बहुत बड़े, प्रसिद्ध या विद्वान व्यक्ति का परिचय देना या उसकी तारीफ करना।
- हँसते का घर बसता है – जो खुशमिजाज रहते हैं, उनके परिवार और समाज में हमेशा खुशहाली रहती है।
- हलाल की कमाई में बरकत होती है – ईमानदारी से कमाए पैसे से जीवन में हमेशा सुख और शांति रहती है।
- क्षमा वीरस्य भूषणम् – क्षमा करना बलवान और वीर व्यक्तियों का सबसे बड़ा आभूषण है।
- अंधे के हाथ बटेर लगना — बिना प्रयास के अचानक लाभ मिलना।
- अपने मुँह मियाँ मिट्ठू — स्वयं अपनी प्रशंसा करना।
- अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत — समय निकल जाने पर पछतावा व्यर्थ।
- अंधेरी नगरी चौपट राजा — अव्यवस्थित शासन या व्यवस्था।
- आगे नाथ, न पीछे पगहा — किसी प्रकार की जिम्मेदारी न होना।
- इधर कुआँ, उधर खाई — दोनों ओर परेशानी/संकट।
- उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे — दोषी ही निर्दोष को दोष दे। अपराधी ही निर्दोष को दोष दे।
- उड़ती चिड़िया पहचानना — बहुत चालाक होना।
- एक और एक ग्यारह — एकता में शक्ति।
- एक हाथ से ताली नहीं बजती — विवाद में दोनों पक्ष जिम्मेदार। झगड़े में दोनों पक्ष दोषी होते हैं।
- एक ही थैली के चट्टे-बट्टे — सभी का स्वभाव एक जैसा होना। एक जैसे स्वभाव, आदत या चरित्र वाले लोग होना।
- कमान से निकला तीर वापस नहीं आता — कही बात वापस नहीं ली जा सकती।
- कुएँ का मेंढक — सीमित ज्ञान वाला व्यक्ति।
- गड़े मुर्दे उखाड़ना — पुरानी बातें फिर छेड़ना। पुरानी बातें फिर उठाना।
- गुड़ गोबर करना — बना-बनाया काम बिगाड़ देना। अच्छा काम बिगाड़ देना।
- चोर की दाढ़ी में तिनका — दोषी स्वयं भयभीत रहता है। दोषी व्यक्ति हमेशा खुद ही डरा रहता है। दोषी व्यक्ति हमेशा अपने आप में ही डरा और आशंकित रहता है।
- जैसी संगति, वैसी रंगति — संगति का प्रभाव पड़ता है।
- जैसी मति, वैसी गति — बुद्धि के अनुसार परिणाम।
- जब तक साँस, तब तक आस — जीवन रहते आशा।
- जबरा मारे और रोने भी न दे — शक्तिशाली का अत्याचार।
- जान है तो जहान है — जीवन सर्वोपरि है।
- जीभ फिसली और बात निकली — अनजाने में रहस्य खुल जाना।
- जितने मुँह, उतनी बातें — लोगों की अलग-अलग राय। एक ही विषय पर हर व्यक्ति का अलग-अलग मत होना।
- टके की हाँडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई — छोटी घटना से असली स्वभाव सामने आना।
- टाँग अड़ाना — दूसरों के काम में बाधा डालना। बाधा डालना।
- टूटे मन का कोई सहारा नहीं — निराश व्यक्ति को संभालना कठिन।
- ढोल की पोल खुलना — वास्तविकता सामने आ जाना।
- ताली एक हाथ से नहीं बजती — झगड़े में दोनों पक्ष दोषी।
- तेते पाँव पसारिए, जेती लंबी सौर — साधन के अनुसार खर्च।
- थाली का बैंगन — अस्थिर विचार वाला व्यक्ति। जिसका कोई स्थिर पक्ष न हो। जो स्थिर मत न रखता हो। जिसका कोई दृढ़ सिद्धांत न हो, जो बार-बार पाला बदलता रहे।
- दिन दूनी, रात चौगुनी — बहुत तेजी से बढ़ना।
- दाँत खट्टे करना — बुरी तरह परास्त करना।
- दिया तले अँधेरा — पास की बात से अनजान होना।
- दूध का जला छाछ भी फूँककर पीता है — बुरे अनुभव के बाद सावधानी।
- दूध का दूध, पानी का पानी — सही-गलत स्पष्ट करना। पूरा न्याय/सच्चाई स्पष्ट होना। बिल्कुल निष्पक्ष और सच्चा न्याय करना।
- दूध की रखवाली बिल्ली को — गलत व्यक्ति को जिम्मेदारी देना।
- नहले पर दहला — बढ़कर जवाब देना।
- न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी — बहाना बनाकर काम टालना। काम न करने के लिए ऐसी शर्त रखना जो कभी पूरी ही न हो सके। असंभव शर्त लगाकर काम टालना। किसी काम के लिए ऐसी शर्त रखना जो कभी पूरी ही न हो सके।
- मुँह फुलाना — नाराज होना।
- मुँह में लगाम न होना — बहुत बोलना।
- लोहे को लोहा काटता है — समान शक्ति ही मुकाबला करती है।
- लालच बुरी बला है — लालच नुकसानदायक है।
- साँप को दूध पिलाना — दुश्मन को पालना।
- सौ सुनार की, एक लोहार की — एक प्रभावी कार्य कई छोटे कामों पर भारी। एक प्रभावशाली काम अनेक छोटे कामों पर भारी पड़ता है।
- सौ दिन चोर के, एक दिन साहूकार का —
- अंधा पीसे, कुत्ता खाए — मेहनत कोई करे, लाभ कोई और उठाए।
- अंधे के आगे रोना, अपना दीदा खोना — असंवेदनशील व्यक्ति से सहानुभूति की अपेक्षा व्यर्थ।
- आम बोकर बबूल की आशा करना — अच्छे परिणाम की अपेक्षा करना पर गलत प्रयास करना।
- आसमान सिर पर उठाना — बहुत शोर-शराबा करना।
- इमली का स्वाद चखे बिना खटाई नहीं जानता — अनुभव के बिना ज्ञान अधूरा है।
- एक लकड़ी से घड़ा नहीं फूटता — बड़े काम के लिए सहयोग चाहिए।
- ओस की बूँद पर इतराना — क्षणिक उपलब्धि पर घमंड करना।
- कमल कीचड़ में खिलता है — कठिन परिस्थिति में भी अच्छाई संभव है।
- कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली — बहुत बड़ा अंतर होना। दो असमान व्यक्तियों की स्थिति या सामाजिक स्तर में ज़मीन-आसमान का अंतर होना।
- घर आए नाग न पूजिए, बाँबी पूजन जाए — पास की चीज का महत्व न समझना।
- घर में गंगा बहाना — घर में ही सुविधा उपलब्ध होना।
- चंदन घिसे तो सुगंध दे — गुणी व्यक्ति से दूसरों को लाभ।
- चोर की माँ कब तक खैर मनाएगी — अपराधी हमेशा नहीं बच सकता।
- चोर को मोर की तरह नाचना — अपराधी का असामान्य व्यवहार।
- जमीन आसमान का अंतर — बहुत अधिक अंतर।
- जब गीदड़ की मौत आती है, शहर की ओर भागता है — विपत्ति में गलत निर्णय।
- जिसकी बिल्ली, उसी से म्याऊँ — आश्रयदाता के सामने अकड़ना। अपने ही व्यक्ति का विरोध करना।
- टूटी नाव का कोई ठिकाना नहीं — अस्थिर व्यक्ति का भरोसा नहीं।
- डूबते जहाज से चूहे भी भागते हैं — संकट में साथी भी छोड़ देते हैं।
- तवे पर से रोटी आग में — एक कठिनाई से दूसरी में जाना।
- तेल तिलों में ही होता है — साधन वस्तु के भीतर ही मौजूद होना।
- दाँत निपोरना — बिना कारण हँसना या खुशामद करना।
- दिन में सपने देखना — असंभव कल्पनाएँ करना।
- दो नावों पर पैर रखना — एक साथ दो पक्षों में रहना।
- न रहेगा रोग, न बजेगा ढोल — कारण समाप्त करने से समस्या खत्म।
- बिना विचारे जो करे, सो पीछे पछताए — बिना सोच किए काम पर पछताना।
- बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय — गलत कर्म से अच्छा फल नहीं मिलता। गलत कर्म से अच्छा फल नहीं मिलता। बुरे कर्म करके अच्छे फल की उम्मीद करना बेकार है।
- मन में मैल रखना — द्वेष रखना।
- मुँह पर मक्खन लगाना — खुशामद करना।
- रात अंधेरी, बात घनेरी — परिस्थिति अस्पष्ट होना।
- रंग बदलना — अपना पक्ष या व्यवहार बदलना।
- रंगे सियार की पोल खुलना — दिखावा अंततः उजागर होना।
- रस्सी को साँप समझना — भ्रम में पड़ना।
- लोहा गरम है, चोट कर — अवसर का तुरंत लाभ उठाना।
- साँप-छछूंदर की दशा — न आगे बढ़ना, न पीछे हटना।
- सिर पर खून सवार होना — अत्यधिक क्रोधित होना।
- सिर पर टोपी, हाथ में कटोरा — बाहरी प्रतिष्ठा के पीछे अभाव होना।
- हाथी के मुँह में जीरा — आवश्यकता की तुलना में बहुत कम।
- हाथ मलते रह जाना — अवसर खोकर पछताना।
- हाथ पर हाथ धरे बैठना — निष्क्रिय रहना।
- हाथ से निकल जाना — नियंत्रण समाप्त होना।
- हाथों के तोते उड़ना — घबरा जाना।
- होम करते हाथ जलना — भलाई करते स्वयं नुकसान उठाना।
- अकाल में तेरह त्योहार — विपत्ति में भी अनावश्यक खर्च या उत्सव।
- आँखों का पानी उतरना — लज्जा समाप्त होना।
- आस्तीन का साँप — अपना होकर धोखा देने वाला।
- आटे में नमक — बहुत थोड़ी मात्रा।
- एक मुँह दो तलवारें — विरोधी बातें करना।
- एक ही नाव के सवार — समान परिस्थिति में होना।
- एक लकड़ी से सबको हाँकना — सबके साथ एक जैसा व्यवहार करना।
- कलेजा मुँह को आना — बहुत घबरा जाना।
- कलेजे पर पत्थर रखना — दुख सहकर कठोर निर्णय लेना।
- कान में तेल डालकर बैठना — जान-बूझकर अनसुना करना।
- कान काटना — बहुत चतुर होना।
- कच्ची गोलियाँ खेलना — अनुभवहीन होना।
- खून के आँसू रोना — अत्यधिक दुख सहना।
- खून मुँह लगना — किसी काम की आदत पड़ जाना।
- गले का काँटा — परेशान करने वाली चीज।
- गले में घंटी बाँधना — जोखिम भरी जिम्मेदारी लेना।
- गागर में सागर भरना — थोड़े शब्दों में बहुत कहना। कम शब्दों में बहुत बड़ी और गहरी बात कह देना।
- गुड़ की डली, चाँदी की थाली — छोटी वस्तु का बड़ा मूल्य।
- घर की दीवारों के भी कान होते हैं — गोपनीय बात सावधानी से कहनी चाहिए।
- जमीन पर पैर न पड़ना — बहुत घमंड या अत्यधिक खुशी।
- जले पर घी डालना — दुख या क्रोध और बढ़ाना।
- जमाना पलटना — समय का पूरी तरह बदल जाना।
- जान हथेली पर रखना — जीवन की परवाह न करना। जान जोखिम में डालना।
- टाँय-टाँय फिस्स होना — प्रयास का निष्फल हो जाना।
- दाँतों में जीभ होना — नाजुक स्थिति में होना।
- दूध में पानी मिलाना — गुणवत्ता में मिलावट करना। दूर की चीजें अच्छी लगती हैं।
- दूध की मक्खी — अप्रिय या अनावश्यक व्यक्ति।
- दो कौड़ी का — बहुत कम मूल्य वाला।
- पेट काटना — अत्यधिक बचत करना।
- पैरों तले जमीन खिसकना — बहुत आश्चर्य या भय होना।
- पल्ला झाड़ना — जिम्मेदारी से बचना।
- बात का बतंगड़ बनाना — छोटी बात को बढ़ाना।
- बातों के बताशे — केवल बातें करना।
- बिना पतवार की नाव — दिशाहीन व्यक्ति।
- बाँहों में बल होना — शक्ति होना।
- भाड़ झोंकना — व्यर्थ समय गँवाना।
- मुँह में घी-शक्कर — शुभ बात कहने पर आशीर्वाद देना।
- मुँह काला होना — अपमानित होना।
- रंगे सियार की तरह — नकली रूप धारण करना।
- रक्त का घूँट पीना — क्रोध को दबाना।
- वक्त की मार — समय की विपरीत परिस्थितियाँ।
- सिर पर भूत सवार होना — किसी विचार का अत्यधिक प्रभाव।
- सिर से पानी गुजरना — सहनशक्ति की सीमा समाप्त होना।
- साँप की तरह कुंडली मारकर बैठना — अधिकार जमाकर बैठना।
- सूरज को ग्रहण लगना — श्रेष्ठता पर संकट आना।
- हवा में उड़ना — अत्यधिक घमंड करना।
- हवा का रुख पहचानना — परिस्थिति का अनुमान लगाना।
- हाथ की मैल — धन को तुच्छ समझना।
- हाथों-हाथ बिकना — तुरंत बिक जाना।
- हाथों में चूड़ियाँ पहनना — कमजोरी दिखाना।
- होश उड़ जाना — बहुत घबरा जाना।
- होश के नाखून लेना — सावधान होना।
- हित अनहित पशु-पक्षी जानें — प्रेम और विरोध का प्रभाव सभी समझते हैं।
- इस हाथ दे, उस हाथ ले – किए गए कर्मों का फल तुरंत और प्रत्यक्ष मिल जाना। कर्मों का फल यहाँ तुरंत और सीधा मिलता है।
- अकेला दीपक अँधेरे को चीर देता है — थोड़ी-सी अच्छाई भी बड़ा प्रभाव डाल सकती है।
- अंधे की लाठी भगवान — असहाय व्यक्ति का एकमात्र सहारा।
- अंधा बाँटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे — अपने लोगों को अनुचित लाभ देना।
- अंधे को अंधेरे में सब बराबर — अज्ञान में सही-गलत का अंतर समझना कठिन होता है।
- अकल के अंधे को रास्ता कौन दिखाए — मूर्ख व्यक्ति सलाह भी नहीं समझता।
- अति की भली न बरसात, अति की भली न धूप — किसी भी चीज की अधिकता अच्छी नहीं।
- अति का अंत बुरा — सीमा से अधिक होने पर परिणाम खराब होता है।
- अन्न बिना सब सूना — भोजन जीवन की मूल आवश्यकता है।
- अन्नदाता का अनादर नहीं करना चाहिए — जीवन देने वाले साधन का सम्मान करना चाहिए।
- असली चेहरा समय दिखाता है — कठिन समय में वास्तविक स्वभाव सामने आता है।
- अपना हाथ, जगन्नाथ — अपना काम स्वयं करना श्रेष्ठ है।
- अपना माल, अपनी मर्जी — अपनी वस्तु पर अपना अधिकार होता है।
- अपनी करनी आप भोगनी — अपने कर्मों का परिणाम स्वयं भुगतना पड़ता है।
- अपनी छाछ को कोई खट्टा नहीं कहता — व्यक्ति अपनी वस्तु की कमी स्वीकार नहीं करता।
- अपनी डफली अपना राग — हर व्यक्ति अपनी ही बात पर अड़ा रहना।
- अपनी गली में कुत्ता भी शेर — अपने क्षेत्र में कमजोर भी प्रभावशाली हो जाता है।
- आँख बची तो लाख बचा — सावधानी से बड़ा नुकसान टल सकता है।
- आँख का देखा झूठ नहीं होता — प्रत्यक्ष अनुभव पर अधिक विश्वास होता है।
- आँख मूँदने से संकट नहीं टलता — समस्या से मुँह छिपाने से वह समाप्त नहीं होती।
- आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया — आय कम और खर्च अधिक होना।
- आम की डाल पर बबूल नहीं फलता — कारण के अनुसार ही परिणाम मिलता है।
- आगे बढ़ने वाले को रास्ता मिलता है — प्रयास करने वाले को अवसर मिलता है।
- आग से निकला धुआँ कहीं न कहीं जाता है — घटना का प्रभाव अवश्य पड़ता है।
- आग बुझी पर राख बाकी — घटना समाप्त होने पर भी उसका प्रभाव रहता है।
- आग और घी का मेल विनाशकारी है — विपरीत या उत्तेजक चीजों का मेल नुकसान करता है।
- आग लगते देर नहीं लगती, बुझाते समय लगता है — समस्या पैदा करना आसान, सुलझाना कठिन है।
- आस बड़ी बलवान — आशा मनुष्य को कठिनाई में टिकाए रखती है।
- आसमान में थूकना अपने मुँह पर पड़ता है — दूसरों की निंदा से स्वयं की बदनामी होती है।
- आटे में नमक बराबर — बहुत थोड़ी मात्रा में होना।
- आधी छोड़ सारी को धावे, आधी मिले न सारी पावे — अधिक लालच में उपलब्ध लाभ भी खो देना।
- इच्छा हो तो उपाय निकलता है — दृढ़ इच्छा से रास्ता खोजा जा सकता है।
- ईश्वर देर करता है, अंधेर नहीं — न्याय देर से हो सकता है, पर होता है।
- उगते सूरज को सब सलाम करते हैं — सफल व्यक्ति का सभी सम्मान करते हैं।
- उधार की खुशी थोड़े दिन की — दूसरों के साधनों पर आधारित सुख स्थायी नहीं होता।
- उधार की जिंदगी कब तक — दूसरों के सहारे हमेशा नहीं चला जा सकता।
- उल्टी गंगा पहाड़ को जाए — बिल्कुल अस्वाभाविक बात होना।
- उलटी खोपड़ी में बात नहीं बैठती — जिद्दी व्यक्ति अच्छी सलाह नहीं मानता।
- ऊँट की चोरी निहोरे से नहीं छिपती — बड़ी बात छिपाना कठिन है।
- ऊँट के नीचे बकरी नहीं चलती — कमजोर व्यक्ति शक्तिशाली के सामने टिक नहीं सकता।
- ऊँचा बोलने से बात बड़ी नहीं होती — केवल शोर से महत्व नहीं बढ़ता।
- एक बूंद से घड़ा नहीं भरता — थोड़े प्रयास से बड़ा काम पूरा नहीं होता।
- एक लकड़ी से नाव नहीं बनती — बड़े काम में सहयोग आवश्यक है।
- एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं — दो प्रभुत्वशाली व्यक्ति साथ नहीं रह सकते।
- एक की गलती, सबकी बदनामी — एक व्यक्ति का दोष पूरे समूह को प्रभावित कर सकता है।
- एक आँख में काजल, दूसरी में धूल — पक्षपातपूर्ण व्यवहार।
- एक हाथ की पाँचों उँगलियाँ समान नहीं — सभी व्यक्ति समान गुण वाले नहीं होते।
- एक बार का धोखा, उम्र भर की सीख — बुरा अनुभव भविष्य में सावधान करता है।
- एक मछली जल की शान — किसी वस्तु का महत्व उसके उचित वातावरण में होता है।
- एकता टूटे तो शक्ति घटे — विभाजन से सामर्थ्य कम होती है।
- ओढ़ी चादर से बाहर पैर नहीं — अपनी सीमा में रहना चाहिए।
- ओस की बूँद सूरज में टिकती नहीं — क्षणिक उपलब्धि स्थायी नहीं होती।
- कच्ची नींव पर पक्का मकान नहीं — कमजोर आधार पर मजबूत काम नहीं बन सकता।
- कच्चे घड़े में पानी नहीं ठहरता — कमजोर व्यवस्था लंबे समय तक नहीं टिकती।
- कब तक बिल्ली खंभा नोचे — क्रोध का कोई स्थायी समाधान नहीं।
- कागज की नाव पानी में नहीं चलती — कमजोर साधन से कठिन काम नहीं हो सकता।
- कौआ कान ले गया, आदमी कान के पीछे भागा — बिना जाँच अफवाह पर विश्वास करना।
- करेला और नीम चढ़ा — एक बुराई के साथ दूसरी बुराई जुड़ जाना।
- कर्म ही पूजा है — ईमानदारी से काम करना सर्वोत्तम है।
- कर भला, हो भला — अच्छे काम का अच्छा परिणाम मिलता है।
- किस्मत के आगे किसका जोर — कुछ घटनाएँ भाग्य पर निर्भर होती हैं।
- कुत्ते को घी हजम नहीं होता — अयोग्य व्यक्ति अच्छी चीज का मूल्य नहीं समझता।
- कुत्ते की मौत आई तो शहर की ओर भागा — विपत्ति में व्यक्ति गलत निर्णय कर सकता है।
- खेत की मूली खेत में ही अच्छी — वस्तु अपने उचित स्थान पर अधिक उपयोगी होती है।
- खाली हाथ आया, खाली हाथ जाएगा — धन-संपत्ति स्थायी नहीं है।
- खाया और पछताया, न खाया और पछताया — निर्णय की कठिन स्थिति।
- खून का रंग सबका लाल — सभी मनुष्यों की मूल समानता।
- खेत सूखा तो किसान रोया — आजीविका के साधन के नष्ट होने पर संकट आता है।
- खेत का पानी खेत में — संसाधन का उचित उपयोग उसी स्थान पर करना।
- खरबूजे की मिठास काटने पर पता चलती है — वास्तविक गुण परीक्षण से पता चलता है।
- गंगा उलटी बहना — प्राकृतिक नियम के विपरीत काम होना।
- गधे को घोड़ा बनाने से घोड़ा नहीं बनता — मूल स्वभाव आसानी से नहीं बदलता।
- गधे के आगे गीता पढ़ना — अयोग्य व्यक्ति को ज्ञान देना व्यर्थ है।
- गुरु बिना गति नहीं — मार्गदर्शन के बिना प्रगति कठिन है।
- गुरु का ज्ञान जीवनभर काम आता है — सही शिक्षा स्थायी लाभ देती है।
- गुड़ मीठा तो चींटियाँ भी आती हैं — लाभ देखकर लोग आकर्षित होते हैं।
- गाँव की बात गाँव में रहे — निजी बात को बाहर नहीं फैलाना चाहिए।
- गाँव बसता है तो लोग आते हैं — अवसर होने पर लोग स्वतः आकर्षित होते हैं।
- गिरा हुआ दूध रोने से वापस नहीं आता — बीती बात पर पछताने से लाभ नहीं।
- गिनती से नहीं, गुणवत्ता से मूल्य होता है — संख्या से अधिक गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।
- घर का योगी जोगड़ा — अपने व्यक्ति की योग्यता का महत्व कम समझना।
- घर की इज्जत घर वालों के हाथ — परिवार की प्रतिष्ठा उसके सदस्यों के व्यवहार पर निर्भर है।
- घर में फूट तो बाहर की जीत — आंतरिक कलह से बाहरी व्यक्ति लाभ उठाता है।
- घर संभले तो बाहर संभले — पहले अपनी व्यवस्था ठीक करनी चाहिए।
- घी सीधी उँगली से न निकले तो टेढ़ी करनी पड़ती है — आवश्यकता पड़ने पर कठोर उपाय करना पड़ता है।
- घमंड का फल पतन — अहंकार अंततः नुकसान करता है।
- चोर की नजर माल पर — लालची व्यक्ति का ध्यान हमेशा लाभ पर रहता है।
- चोर को चौकीदार बना देना — गलत व्यक्ति को जिम्मेदारी देना।
- चोर की चोरी और ऊपर से रोब — गलती करके भी अकड़ दिखाना।
- चाँद को ग्रहण लगना — अच्छे व्यक्ति या वस्तु पर संकट आना।
- चाँदी की चम्मच लेकर पैदा होना — जन्म से ही संपन्न होना।
- चादर छोटी हो तो पैर समेटो — आय के अनुसार जीवन चलाना।
- चिंता से चतुराई नहीं आती — अत्यधिक चिंता समस्या का समाधान नहीं करती।
- चुप्पी भी एक उत्तर है — हर बात का जवाब बोलकर देना आवश्यक नहीं।
- चूहे के बिल में बिल्ली का डेरा — बचने की जगह पर ही खतरा आ जाना।
- चूहे के डर से बिल न छोड़ो — छोटी परेशानी के कारण बड़ा अवसर नहीं छोड़ना चाहिए।
- चोर की चौकसी बेकार — गलत व्यक्ति से सुरक्षा की उम्मीद करना व्यर्थ है।
- चंदन घिसने से सुगंध बढ़ती है — गुणी व्यक्ति के संपर्क से लाभ होता है।
- छोटा दीपक भी अँधेरा हरता है — छोटी सहायता भी महत्वपूर्ण होती है।
- छोटे बीज से बड़ा पेड़ — छोटी शुरुआत से बड़ा परिणाम मिल सकता है।
- जिसे चोट लगी वही दर्द जाने — पीड़ा का वास्तविक अनुभव पीड़ित ही जानता है।
- जिसकी नाव मजबूत, उसे लहरों का डर कम — मजबूत तैयारी से संकट का भय कम होता है।
- जिसके हाथ में हुनर, उसके हाथ में काम — कौशल वाले व्यक्ति को काम मिलता है।
- जिसके घर में आग, उसे धुआँ दिखता है — अपनी समस्या सबसे अधिक महसूस होती है।
- जंगल में मंगल — कठिन स्थान पर भी खुशी या उत्सव होना।
- जंगल का कानून — जहाँ शक्तिशाली का ही नियम चलता हो।
- जितना काम, उतनी मजदूरी — मेहनत के अनुसार प्रतिफल मिलना चाहिए।
- जितनी जरूरत, उतना खर्च — आवश्यकता के अनुसार संसाधन लगाना।
- जमीन से जुड़ा व्यक्ति ही मजबूत रहता है — विनम्रता व्यक्ति को स्थिर रखती है।
- जान बची तो लाखों पाए — जीवन धन से अधिक मूल्यवान है।
- जुबान की चोट तलवार से गहरी — कठोर शब्द गहरा मानसिक दुख देते हैं।
- जीभ फिसली, राज खुला — असावधानी से रहस्य खुल जाना।
- जीवन चार दिन का मेला — जीवन अस्थायी है।
- जैसा बीज, वैसा वृक्ष — प्रारंभ के अनुसार परिणाम मिलता है।
- टूटी डोरी फिर गाँठ से जुड़ती है — संबंध टूटने के बाद भी सुधारे जा सकते हैं।
- टूटे मन को शब्द सहारा देते हैं — सांत्वना दुखी व्यक्ति को संभालती है।
- टाँग खींचने से कोई ऊँचा नहीं होता — दूसरों को गिराने से स्वयं की उन्नति नहीं होती।
- टूटा ताला चोर को बुलाता है — कमजोरी खतरे को आमंत्रित करती है।
- ठोकर ही राह सिखाती है — गलतियों से अनुभव मिलता है।
- ठहरे पानी में काई जमती है — निष्क्रियता से स्थिति बिगड़ती है।
- डाली काटोगे तो छाया कहाँ पाओगे — अपने आधार को नुकसान पहुँचाने से स्वयं को हानि होती है।
- डूबते सूरज का कोई साथी नहीं — शक्ति घटने पर साथ देने वाले कम हो जाते हैं।
- डर के मारे बिल्ली भी पेड़ चढ़े — भय व्यक्ति से असामान्य काम करा सकता है।
- ढलती उम्र का सहारा अनुभव — उम्र बढ़ने पर अनुभव महत्वपूर्ण बनता है।
- ढूँढ़ने वाले को रास्ता मिलता है — प्रयास करने पर समाधान मिलता है।
- तूफान से पहले सन्नाटा — बड़ी घटना से पहले असामान्य शांति।
- तेज हवा कमजोर पेड़ गिराती है — कमजोर आधार संकट में टिकता नहीं।
- तेल तिलों में ही होता है — आवश्यक साधन मूल स्रोत में ही मिलता है।
- तिनका भी डूबते का सहारा — संकट में छोटी मदद भी बड़ी होती है।
- तीर कमान से निकल जाए तो लौटता नहीं — कही बात वापस नहीं ली जा सकती।
- थाली में छेद करना — लाभ देने वाले साधन को ही नुकसान पहुँचाना।
- देर का काम अंधेर नहीं — देर से हुआ सही काम भी मूल्यवान है।
- दाम से काम बनता है — धन से कई कठिन काम आसान हो जाते हैं।
- दूर की आग अधिक चमकती है — दूर की चीज आकर्षक लग सकती है।
- दुश्मन को कमजोर समझना भूल है — विरोधी को कम आँकना नुकसानदायक है।
- दो बुरे मिलकर बड़ा बुरा करते हैं — समान दोष वाले लोग मिलकर समस्या बढ़ा सकते हैं।
- दो हाथ से काम बनता है — सहयोग से कार्य आसान होता है।
- दो दिन की जिंदगी, हँसकर बिताओ — जीवन छोटा है, प्रसन्न रहना चाहिए।
- दो ध्रुव कभी नहीं मिलते — बहुत विपरीत विचारों का मेल कठिन होता है।
- नदी का पानी बहता रहे तो साफ रहता है — निरंतर सक्रियता से जीवन बेहतर रहता है।
- नकल में भी अक्ल चाहिए — किसी की नकल करना भी समझदारी माँगता है।
- नरम लकड़ी जल्दी कटती है — अत्यधिक सरल व्यक्ति का लोग लाभ उठा सकते हैं।
- नमक बिना भोजन फीका — छोटी चीज भी पूरे परिणाम के लिए जरूरी हो सकती है।
- नियत साफ तो डर कैसा — ईमानदार व्यक्ति को भय कम होता है।
- नींव मजबूत तो इमारत मजबूत — मजबूत आधार सफलता की कुंजी है।
- नाविक जाने नाव की चाल — अनुभवी व्यक्ति काम की बारीकियाँ जानता है।
- पानी सिर पर चढ़े तो बाँध टूटता है — सीमा पार होने पर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है।
- पैर फिसले तो चोट, जुबान फिसले तो रिश्ते टूटें — शब्दों में सावधानी जरूरी है।
- पहाड़ काटने से रास्ता बनता है — निरंतर मेहनत से कठिनाई दूर होती है।
- पहले सोचो, फिर बोलो — बोलने से पहले परिणाम पर विचार करना चाहिए।
- प्यासे को पानी अमृत — जरूरत के समय साधारण चीज भी बहुत मूल्यवान होती है।
- पेट भरा तो मन शांत — मूल आवश्यकता पूरी होने से चिंता कम होती है।
- परोपकार से बड़ा धर्म नहीं — दूसरों की सहायता श्रेष्ठ कार्य है।
- पंख मिले तो उड़ान भरनी चाहिए — अवसर मिलने पर उसका उपयोग करना चाहिए।
- पेड़ फल से झुकता है — गुणी व्यक्ति विनम्र होता है।
- फूल की खुशबू दूर तक जाती है — अच्छे गुण दूर तक प्रसिद्ध होते हैं।
- बंदर की नकल में बिल्ली भी फँसी — बिना सोचे नकल करना नुकसानदेह हो सकता है।
- बिन बादल बिजली नहीं चमकती — घटना का कोई न कोई कारण होता है।
- बिना जड़ पेड़ नहीं टिकता — आधार के बिना स्थायित्व नहीं होता।
- बिना नाविक नाव भटकती है — मार्गदर्शन के बिना दिशा खो जाती है।
- बिना तेल दीपक नहीं जलता — काम के लिए आवश्यक साधन चाहिए।
- बुरे समय का साथी ही सच्चा साथी — संकट में साथ देने वाला वास्तविक मित्र है।
- बूढ़े बैल से हल नहीं चलता — हर काम के लिए उचित क्षमता जरूरी है।
- बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम — उम्र के विपरीत अत्यधिक सजना-सँवरना।
- बड़े पेड़ की छाया दूर तक — महान व्यक्ति का प्रभाव व्यापक होता है।
- बात बढ़े तो विवाद बढ़ता है — छोटी बात को खींचने से समस्या बढ़ती है।
- मन में मैल हो तो बाहर की सफाई व्यर्थ — आंतरिक शुद्धता जरूरी है।
- मन मजबूत तो मुश्किल आसान — दृढ़ मन से कठिनाई कम लगती है।
- मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है — कर्म से जीवन की दिशा बदली जा सकती है।
- मुँह की मिठास दिल जीतती है — मधुर व्यवहार से संबंध अच्छे होते हैं।
- मुँह से निकली बात वापस नहीं आती — बोलने से पहले सोचना चाहिए।
- मुफ्त की चीज की कीमत नहीं समझी जाती — बिना मेहनत मिली वस्तु का महत्व कम लगता है।
- रास्ता वही मिलता है जो चलता है — प्रयास करने वाले को अवसर मिलता है।
- रात के बाद सवेरा — कठिन समय के बाद अच्छा समय आता है।
- राई बराबर बात को पहाड़ मत बनाओ — छोटी बात को बड़ा नहीं बनाना चाहिए।
- रस्सी की ताकत गाँठ में — एकता से शक्ति बढ़ती है।
- लालच में लाभ भी हाथ से जाता है — अत्यधिक लालच नुकसान करा सकता है।
- लोभ का अंत शोक — लालच अंततः दुख देता है।
- वक्त पर काम आए वही अपना — आवश्यकता में मदद करने वाला सच्चा अपना है।
- वक्त का पहिया घूमता रहता है — परिस्थितियाँ हमेशा बदलती रहती हैं।
- वाणी में मिठास, जीवन में प्रकाश — मधुर भाषा से संबंध अच्छे होते हैं।
- साँस है तो आस है — जीवन रहते उम्मीद रहती है।
- संकट में ही साहस की परीक्षा — कठिन समय में वास्तविक हिम्मत सामने आती है।
- सच्चे मोती गहरे पानी में मिलते हैं — मूल्यवान चीज पाने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है।
- सच्चा सौदा देर से सही, लाभ देता है — ईमानदार काम का परिणाम अच्छा होता है।
- सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं — सफलता के लिए मेहनत जरूरी है।
- सौ बार सोचो, एक बार बोलो — बोलने से पहले अच्छी तरह विचार करना चाहिए।
- सौ हाथों का काम एक हाथ से नहीं होता — बड़े काम में सामूहिक प्रयास चाहिए।
- सूरज को बादल देर तक नहीं ढक सकते — सत्य या वास्तविकता लंबे समय तक छिपी नहीं रहती।
- सुख बाँटने से बढ़ता है — खुशी साझा करने से और बढ़ती है।
- संकट में धैर्य सबसे बड़ा हथियार — कठिन समय में धैर्य आवश्यक है।
- हाथ का हुनर कभी बेकार नहीं जाता — कौशल जीवन में हमेशा काम आता है।
- हाथी की चाल धीमी पर भारी — धीमी गति से किया गया मजबूत काम प्रभावी होता है।
- हवा का रुख देखकर नाव चलाओ — परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।
- होशियार को इशारा काफी — बुद्धिमान व्यक्ति संकेत से बात समझ लेता है।
- हिम्मत करने वाले की हार नहीं होती — साहस और प्रयास से सफलता की संभावना बढ़ती है।
